भारत को चाहिये - शिक्षा 3.0

शिक्षा के क्षेत्र में हमें गुणवत्ता पर केन्द्रित रहना चाहिये और यह सुनिश्चित करना चाहिये कि दाखिला प्राप्त करने वाला प्रत्येक विद्यार्थी सीखने के लक्ष्य की सबसे सीधी राह को पा सकें।

शिक्षा और अध्यापन को समूचे विश्व में मानव समुदाय की जरुरतों के अनुसार विकसित किया गया है। अध्यापन का पहला अभिलेखित मॉडल भारत में गुरुकुलों का और ग्रीस में अकादमियों का था, जहाँ केवल प्रभावशाली और अत्यन्त सौभाग्यशाली परिवारों के बच्चों को ही प्रवेश मिलता था। इनमें शिक्षकों और विद्यार्थियों का अनुपात काफी ऊँचा होता था। प्रत्येक विद्यार्थी (और उनके अभिभावकों की भी) जरुरतों के मुताबिक ही पाठ्यक्रम और कक्षा का समय रखा जाता था और अध्यापन के विषयों में भी खगोल विज्ञान से प्राणीशास्त्र तक शामिल होते थे। विद्यार्थी प्राय: इस प्रकार के मॉडल में कामयाब भी होते हैं, मगर यह परिगणना से परे थे । सदियों तक औपचारिक शिक्षा कुछ गिने-चुने विद्यार्थियों के दायरे में रही, जबकि थोक आर्थिक उपलब्धियाँ मानवीय श्रम से ही हासिल होती रही है।

ओद्यौगिक युग के आगमन के साथ ही हमने देखा कि प्रोद्यौगिकियों में बड़ी तेजी से परिवर्तन हुए जिससे मानव समुदाय के आकलन के अर्थ फिर से गढ़े गये। भाप के इंजन से, रेडियो, हार्वेस्टर, सैटेलाईट और इण्टरनेट, मशीनों ने पशुचालित उपकरणों और मानव श्रम को प्रतिस्थापित किया। यद्यपि इस हटाये जाने में हमें इस बात की जरुरत महसूस हुई कि सकल कार्यबल में और ज्यादा शिक्षित और प्रशिक्षित लोग शामिल किये जायें जो इन यंत्रों और संरचनाओं का बेहतर तरीके से प्रबन्ध कर सके। इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप आधुनिक शिक्षा प्रणाली का अभ्युदय हुआ यह हम सभी जानते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही दिखता है जैसे आज हम जिन बहुत-सी नौकरशाहियों में अपने को घिरा हुआ पाते हैं वो किसी एक संधिस्थल पर हों ।

आज की शिक्षा प्रणाली ने "एक से अनेक को प्रसारण" वाले मॉडल को अपनाया है क्योंकि एक साथ बड़े जन समुदाय तक सूचनाएँ पँहुचाने की यही एक सबसे सीधी राह है। भारत में दो सौ मिलियन से अधिक विद्यार्थियों तक पँहुचने की चुनौती का सामना करने के लिये यह एक से अनेक वाला मॉडल ही सबसे अच्छा समाधान है। यद्यपि अब समय आ गया है कि हमारी मूलभूत प्राथमिकताओं तक पुन: पँहुचे और हम अपने लिये कुछ और महत्वाकाँक्षी लक्ष्य बनायें।

पिछले छ: दशक में, भारतीय शिक्षा प्रणाली की प्राथमिकता साफ तौर पर विद्यार्थियों के शत-प्रतिशत नामांकन कर बच्चों की स्कूल छोड़ने की ऊँची दरों की जड़ता के खिलाफ नामांकन को बढ़ावा देना है। बजट का एक बड़ा हिस्सा (वर्ष 2005- 2012 में 99,100 करोड़ रुपये) ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड जैसी बड़े पैमाने की नीतियाँ, मध्याह्न भोजन कार्यक्रम और सर्वशिक्षा अभियान से सन् 2011 में राष्ट्रीय साक्षारता दर 74.04 प्रतिशत प्रौढ़ साक्षरता के लिये और वर्ष 2015 में 90.2 प्रतिशत युवा साक्षरता के सन्दर्भ में थी। युवा से आशय पन्द्रह से चौबीस वर्ष के बीच की आबादी है। केरल जैसे कुछ राज्यों में साक्षरता दर 94  प्रतिशत है। इस स्तर पर आईये थोक नामांकन को शिक्षा 2.0 का नाम दें। प्राथमिक शिक्षा अब मौलिक अधिकार बन गया है और इसे लागू करने के समुचित प्रयास किये जा रहें हैं।

अब हमें जरुरत शिक्षा 3.0 की है ताकि शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान केन्द्रित कर सकें, सभी नामांकित विद्यार्थी सीखने के अपने लक्ष्य को हांसिल करने के लिये सबसे सीधी राह पा सकें और रोजगार भी मिल सके। सरकार शिक्षा पर जो खर्च कर रही है वह नवाचार के बुनियादी आधार बनाने जैसे कि सभी शैक्षणिक संस्थाओं में मुफ्त वाई-फाई मुहैया करवाने, देश के सभी विद्यालयों और महाविद्यालयों में प्रत्येक विद्यार्थी को टेबलेट प्रदान करने और प्रत्येक शिक्षक और विद्यालय प्रशासकों को स्मार्ट डिवाइस से सज्जित करने पर खर्च करना चाहिये। इसे आधार बनाने में सबसे शीर्ष स्थान, लोक व्यय का निवेश और प्रोत्साहन मुहैया करवाने को दिया जाना चाहिये जो उच्च गुणवत्ता वाली शैक्षिक सामग्री विकसित करने में सहायक हो। यह सामग्री बहुभाषी और बहुआयामीय होनी चाहिये और उससे एक मुक्त नि:शुल्क राष्ट्रीय ज्ञान का आधार बनना चाहिये। शिक्षकों की भूमिका को सूचनाओं के प्रसार से सामग्री के उपचार ओर उससे कहीं आगे की समस्याओं का समाधान होना चाहिये।

स्मार्ट और संबद्ध उपकरणों के आधार स्थापित करने के निर्दिष्ट प्रसार के साथ हम विश्व में शैक्षिक नवाचार का पहला सार्वभौमिक मँच बना सकते हैं। प्रोद्यौगिकी के अनुकूल शैक्षणिक मॉडल को औपचारिक शिक्षा को बढ़ावा देना होगा ताकि वो हमारी श्रेष्ठ नवाचार कम्पनियों को मुक्त कर सके। उपाय के लिए वैयक्तिक और स्वीकार्य शिक्षण,  बहुआयामीय अनुसार एवम् अभ्यास का वातावरण, आँकड़ों द्वारा संचालित सतत मूल्यांकन में सुधार और ताउम्र शिक्षण-प्रशिक्षण का यह मॉडल एक ज्यादा सक्षम और उत्पादक कार्यबल तैयार करेगा ।

शिक्षा अब कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं रहा है और यह एक अच्छी बात है। अब हम 3.0 शिक्षा चाहते हैं जो पहिए की दिशा को घुमाकर भारतीय शिक्षा को कई गुणा बना सके, और ऐसा संभव है।

                  
-टी.वी. मोहनदास पाई, एरिन कैपीटल और मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन के चेयरमैन हैं। पाई पहले इन्फोसिस के संचालक मण्डल के सदस्य और सी.एफ.ओ. भी रहे हैं। उन्होंने दस कोषों की स्थापना में भी सह- संस्थापक की भूमिका निभाई जो गहन प्रोद्यौगिकी, मानव विज्ञानों और शिक्षा में निवेश करते हैं।

-प्रणव पाई, 3वन4 कैपिटल के फण्डिंग पार्टनर हैं और आरम्भिक स्तर पर वेंचर कैपिटल फण्ड जो भारत और अमेरीका में प्रोद्यौगिकी निवेश में आगे है, उससे भी जुड़े रहे। इससे पहले वे ईडीकास्ट में लीड प्रोडेक्ट मैनेजर भी रहे। पाई ने स्टेनफोर्ड से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की थी।

साभारः डीएनएइंडिया.कॉम

http://www.dnaindia.com/analysis/column-what-india-needs-is-an-education...