जीएसटी का मलेशियाई हश्र और भारत पर प्रभाव

मलेशिया की नवनिर्मित डा. महातिर बिन मोहम्मद सरकार ने देश में गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स अर्थात जीएसटी को समाप्त कर दिया है। ऐसा करके उन्होंने चुनाव पूर्व देश की जनता के साथ किए वादे को पूरा किया है। भारत के पूर्व मलेशिया ही वह आखिरी देश था जिसने अपने यहां जीएसटी लागू किया था। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस नई कर प्रणाली को लागू होने के तीन वर्षों के भीतर ही समाप्त करने की जरूरत आन पड़ी? इसकी विवेचना कर रहे हैं वरिष्ठ टीवी पत्रकार नवीन पाल..    

मलेशिया में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी इस साल 31 मई को पूरी तरह खत्म हो गया। मलेशिया में जीएसटी की उम्र महज तीन साल रही। मलेशिया में इस नई टैक्स प्रणाली को तीन साल पहले गाजे बाजे के साथ लागू किया गया था। भारत से पहले जीएसटी लागू करने वाला आखिरी देश मलेशिया ही था। भारत ने जीएसटी लागू करने से पहले मलेशिया के प्रारूप का बारीकी से अध्ययन किया और मुनाफाखोरी खत्म करने जैसे कई प्रावधान वहीं से लिये। तो क्या हमें मलेशिया की गलतियों से कुछ सीखने की जरूरत है? यकीनन हम उन गलतियों से तो सबक ले ही सकते है जिसकी वजह से मलेशिया को अपने कदम जीएसटी से पीछे खींचने पर मजबूर होना पड़ा। जरूरी नहीं कि हम खुद ठोकर लगने पर ही सीखें। दूसरे को लगती ठोकर से भी काफी कुछ सीखा जा सकता है।

मलेशिया में जीएसटी एक अप्रैल 2015 को लागू किया गया। तब वहां नजीब रज्जाक सरकार थी। जीएसटी लागू होने के बाद मलेशिया में वो लोग भी टैक्स देने लगे जो अभी तक इसके दायरे से बाहर थे। इससे लोगों की आमदनी तो बढ़ी नहीं मगर जीएसटी ने उनकी कमाई पर हमला बोल दिया। इससे महंगाई भी बढ़ी और सरकार से अपेक्षा भी कि जब हर बात पर टैक्स दे रहे हैं तो सुविधाएं कहां हैं? वर्ष 2017 में जीएसटी से मलेशिया को करीब 74,440 करोड़ की स्थानीय मुद्रा में कमाई हुई। बावजूद इसके वहां हाल बेहाल था। इसका कारण जीएसटी का 'एक' स्लैब होना था। जीएसटी की मात्र एक दर 6 फीसदी लगाकर उसी दर पर लक्जरी कारों और नियमित घरेलू सामानों पर समान कर लगाया गया। जीएसटी से नाराज लोगों ने नजीब सरकार के खिलाफ वोट दिया। जीएसटी इस वर्ष मलेशिया के आम चुनाव में उठाए गए अहम मुद्दों में से एक था। प्रधानमंत्री महातिर बिन मोहम्मद ने चुनाव में वोट बैंक के लिए जीएसटी मुद्दे पर खूब जोर दिया। महातिर मोहम्मद की जीत के पीछे एक बड़ा कारण जीएसटी भी माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने ऐलान किया था कि चुनाव जीतते ही वो जीएसटी हटा देंगे। और हुआ भी ऐसा ही।

भारत के नीति निर्माताओं ने मलेशिया की अप्रत्यक्ष कर संरचना का बारीकी से अध्ययन किया। इस अध्ययन के बाद ये स्पष्ट हुआ कि मलेशिया में सभी तरह की वस्तुओं पर जीएसटी दर 6 प्रतिशत था। जीएसटी की एक ही दर से के कारण अत्यावश्यक (एसेंसियल कमोडिटी) वस्तुओं और लग्ज़री वस्तुओं के लिए एक समान कर की प्रणाली संभवतः वहां के लोगों को रास नहीं आई। संभवतः यही कारण है कि जीएसटी वहां असफल साबित हुआ। मलेशिया के विपरीत भारत में जीएसटी की दरें अलग अलग हैं। केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ कर दिया था कि देश में जीएसटी की एक फ्लैट दर नहीं होगी। तब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि सिंगल रेट जीएसटी संभव नहीं है क्योंकि देश में रह रहे लोगों की खरीद शक्ति एक समान नहीं है। हमारे पास ऐसा टैक्स सिस्टम नहीं हो सकता है जिसमें हवाई चप्पल और मर्सिडीज कार के लिए समान दर हो। यहां जीएसटी को 5 टैक्स स्लैब्स यानी 0%, 5%, 12%, 18% और 28% में बांटा गया है। भारत ने इस मामले में कनाडा का अनुसरण किया है जहां जीएसटी की कई दरें हैं और 1991 से वहां ये टैक्स प्रणाली शानदार तरीके से काम कर रही है। 

देश में यूपीए सरकार के समय जब जीएसटी की परिकल्पना की गई थी तब ये मलेशिया की तर्ज पर यहां भी दरों को एक स्लैब में करने का विचार प्रस्तुत किया गया था। उस समय के वित्त मंत्री पी चिदंबरम कई स्लैब दरों के खिलाफ थे। लिहाजा जब एनडीए सरकार ने जीएसटी लागू किया तो चिदंबरम ने ये कहकर इसका विरोध किया कि ये आधा अधूरा है। उनकी पार्टी (यूपीए सरकार के दौरान) ने जो जीएसटी का प्रारूप दिया था ये वो नहीं है। ये कैसा टैक्स है जिसमें कई दरें हैं? उन्होंने मौजूदा जीएसटी को 'एक राष्ट्र एक कर' के नारे का भी मजाक उड़ाया था।

मलेशिया में जीएसटी वापसी की पहल से भारत पर तत्काल असर पडऩे की संभावना नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केन्द्र सरकार मलेशिया के अनुभव का बारीकी से अध्ययन कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार सरकार जीएसटी में विस्तार के लिए चरणबद्ध तरीके से अतिरिक्त सुधार लाने के कदम उठा सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक मलेशिया में जीएसटी का खात्मा भारत के नीति निर्धारकों के लिए एक चेतावनी हो सकता है। इस घटनाक्रम के बाद भारत भी जीएसटी के लिहाज से अगले तीन-चार साल तक सावधानी से कदम आगे बढ़ा सकता है। देश में एक जुलाई 2017 से लागू जीएसटी अब भी पूरी तरह व्यवस्थित नहीं हो पाया है बावजूद इसके राजस्व से प्राप्त आंकड़ें हैरतअंगेज करने वाले हैं। देश में जीएसटी अपने शैशव काल में है और इसे लागू हुए एक साल भी नहीं हुआ है पर इस साल अप्रैल में मिले आकड़ों के मुताबिक राजस्व संग्रह छह अंकों की संख्या यानि एक लाख करोड़ के आंकड़े को पार पहुंच गया है। अप्रैल माह में सरकार को 1,03,458 करोड़ रुपये जीएसटी के मद में मिले हैं। सरकार को उम्मीद है कि अभी ये आंकड़ा धीरे धीरे और बढ़ेगा और सरकार की झोली अप्रत्यक्ष कर से भर जाएगी।

हालांकि मलेशिया में जीएसटी की विदाई की व्याख्या अनेक लोग अपने अपने तरीके से कर रहे हैं। कुछ की दलील है कि जिस भी सरकार ने जीएसटी लागू किया उसे अगले चुनाव के बाद सत्ता से जाना पड़ा। अपने तर्क के लिए वो ताजा मिसाल मलेशिया की नजीब सरकार की देते हैं। वो कहते हैं कि मलेशिया से पहले जीएसटी की वजह से ही कनाडा में भी सत्ताधारी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था। कनाडा के प्रधानमंत्री और कंजर्वेटिव पार्टी के नेता किम कैंपबेल को 1993 के राष्ट्रीय चुनाव में करारी हार के बाद सत्ता से हटना पड़ा क्योंकि उनकी सरकार ने जीएसटी को लागू करने के बाद अपनी लोकप्रियता गंवा दी थी।

यही हाल ऑस्ट्रेलिया में भी जीएसटी लागू करने के बाद दिखा था। ऑस्ट्रेलिया में जॉन हॉवर्ड की सरकार जीएसटी लागू करने के तुरंत बाद 1998 में हुए चुनावों में बड़ी मुश्किल से वापसी की थी। सिंगापुर ने भी 1994 में जब जीएसटी लागू किया था तो वहां महंगाई काफी बढ़ गई थी। अब देखना है कि भारत के परिपेक्ष्य में मोदी सरकार के लिए ये बात 2019 लोकसभा चुनाव में कितनी सटीक बैठती है। 

- नवीन पाल (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं)

नवीन पाल

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