जीएम अनाज अमेरिका में तो सुरक्षित माना जाता है लेकिन भारत में नहीं

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समूह ने जेनेटीकली मॉडीफाइड (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल पर 10 साल की पाबंदी लगाने का सुझाव दिया है। इससे निकट भविष्य में उनकी फसल उगाए जाने की संभावना पर रोक लग जाएगी। कांसार्टियम इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन्स के महासचिव चेंगल रेड्डी ने इसका यह कहकर विरोध किया है कि यह किसानों के हितों के खिलाफ है जिन्हें ज्यादा पैदावार देनेवाली और कम कीटनाशकों का उपयोग करनेवाली जीएम फसलों की जरूरत है। भारतीय उपभोक्ताओं को भी ज्यादा उत्पादन और कीटनाशकों के कम इस्तेमाल से लाभ होगा।
 
सामाजिक कार्यकर्ता जीएम फसलों को खतरनाक राक्षस की तरह पेश कर रहे हैं। चेंगल रेड्डी का कहना है कि जीएम फसलें कई दशकों से सुरक्षित तरीके से विश्वभर में उगायी और खायी जा रही है। अमेरिका एक मुकदमा प्रिय देश है। जहां वकील नागरिकों के हितों को नुकसान होने के बारे में जरा सी भी तथ्य मिलने पर मुकदमा ठोंक देते हैं। उनमें से किसी ने भी अबतक जीएम फूड के खिलाफ क्लास सूट मुकदमा नहीं किया।
 
जीएम फसलों में सबसे ज्यादा मक्का और सोयाबीन उगाया जाता है, जिन्हें सीधे खाया जाता है और उनका उपयोग खाने का तेल निकालने के लिए किया जाता है। इससे बड़ी बात यह है कि इसका पशुओं के चारे की तरह उपयोग किया जाता है इस कारण वह सारी मांस और डेयरी श्रृंखला का हिस्सा बन जाता है। इसके बावजूद किसी तरह से हानिकारक होने के तथ्य सामने नहीं आए। फिर उसे क्यों राक्षसी अनाज कहा जाए?
 
रेड्डी द्वारा कोर्ट में दायर वक्तव्य में कहा गया है कि 29 देशों में 16 करोड़ हेक्टेयर में जीएम फसलें उगायी जाती हैं। और वे देश जो उसे उगाते नहीं हैं वे (य़ूरोपीय देशों सहित) आयात करते हैं। उनका कहना है कि 30 करोड़ अमेरिकी, 135 करोड़ चीनी, 28 करोड़ ब्राजीली और अन्य देशों के करोड़ो लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से नियमित रूप से जीएम अनाज खाते हैं। फिर उसे भारतीयों के लिए क्यों खतरनाक माना जाए। यह किस तरह अदालतों या विशेषज्ञ कमेटियों का मामला है।
 
यूरोपियों ने जीएम फूड के बारे में बहुत प्रमुख आशंकाएं प्रगट की थी। इसके बावजूद यूरोप जीएम मक्का की फसले उगाने की अनुमति देता है। वह जीएम मक्का और सोयाबीन को जानवरों के चारे की तरह आयात करता है। करोड़ों यूरोपीय अमेरिका और दक्षिण अमेरिका जाते हैं और वहां जीएम फूड़ खाते हैं और किसी तरह के जहरीलेपन का शिकार भी नहीं होते।
 
तीस लाख भारतीय अमेरिकी नागरिक बने हैं। और लाखों पर्यटन और व्यापार के लिए अमेरिका जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और सांसद भी अमेरिका जाते हैं। सोनिया गांधी भी वहां इलाज के लिए गईं थी। किसी को इस आधार पर नहीं रोका गया कि वे अमेरिका में राक्षसी खाद्यान्न खाएंगे। फिर सामाजिक कार्यकर्ता कैसे यह दावा कर सकते हैं कि जीएम खाद्यान्न खतरनाक है और उसे तमाम किस्म की मंजूरियों के बगैर भारत में नहीं उगाया जाना चाहिए जिन्हें अन्य फसलों के लिए जरूरी नहीं माना जाता है।
 
न्याय का प्राथमिक सिद्धांत यह माना जाता है कि जबतक आप दोषी साबित नहीं होते तबतक आपको निर्दोष माना जाता है। लेकिन भारत के सामाजिक कार्यकर्ता चाहते हैं कि जीएम फसलों को तबतक दोषी माना जाए जबतक वे स्वयं को निर्दोष न साबित कर दें। उन्होंने स्क्रीनिंग के लिए जो 10 वर्ष की पाबंदी सहित लंबी चौड़ी प्रक्रिया शुरू की है उसके पीछे उनकी यही दलील है।
 
कार्यकर्ताओं का कहना है कि अबतक जीएम फसलें हानिकारक साबित नहीं हुईं हैं लेकिन भविष्य में साबित हो सकती हैं इसलिए बहुत सावधानीयुक्त स्क्रीनिंग की जरूरत है। यह कहना उसी तरह है कि कुछ मुस्लिम आतंकवादी हैं इसलिए सभी मुस्लिमों की कठोर स्क्रीनिंग की जानी चाहिए। बगैर कठोर स्क्रीनिंग के कुछ आतंकवादियों को रोकने में बहुत देर हो जाएगी। तो क्या सभी मुस्लिमों को खतरनाक मानकर व्यवहार करने के लिए यह दलील दी जा सकती है?
 
रेड्डी ने कहा कि परंपरागत कृषि तकनीकों की सीमाएं है और वे उन जटिल समस्याओं को हल नहीं कर सकती जिन्हें जीएम तकनीक हल कर सकती है। वह इस बात से चकित हैं कि कार्यकर्त्ताओं और कथित विशेषज्ञों द्वारा उन सुप्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिकों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। जिन्होंने दो दशक तक बायो तकनीक के विकास का मार्गदर्शन किया है। उन्होंने इस बात पर अचरज जताया कि अदालत ने किसान समूहों से मशविरा नहीं किया।
 
कार्यकर्ताओं ने भारत में बीटी काटन का कड़ा विरोध किया और यह दावा करते हुए बोगस रपटे जारी कीं कि व्यावहारिक स्तर पर इसकी फसलें नाकाम रहीं है। लेकिन किसान जल्दी ही अपने अनुभव से जान गए कि कि बीटी काटन बहुत लाभदायक है। तीन करोड उसे अपनाने के लिए तत्पर हो गए। नतीजतन कपास का उत्पादन दोगुना हो गया वह भी बहुत कम कीटनाशकों का इस्तेमाल करके। इससे निर्यात भी बढ़ा।
 
कार्यकर्ताओं और कुछ कथित विशेषज्ञों ने यह गुस्ताखी कर दिखाई है कि बीटी काटन से किसानों को कोई लाभ ही नहीं हुआ। यह है झूठे भविष्यवक्ताओं से हताश भिक्षावृति। यह कहना किसानों का अपमान है कि वे इतने मूर्ख हैं कि वे ऐसी तकनीक के पीछे भाग रहे हैं जिससे उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा। पंजाब के किसान 30000 रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन लीज पर दे रहे हैं। क्या वे ऐसा करते यदि वह लाभदायक नहीं होता?
 
आखिर में सुप्रीम कोर्ट इस सब में क्यों पड़ रहा है? दुनियाभर में कुछ सरकारों ने जीएम फसलों को इजाजत दी है, कुछ ने नहीं। लेकिन कहीं भी यह न्यायिक मुद्दा नहीं बना। सुप्रीम कोर्ट गरीबों और कमजोरों की आवाज सुनने और मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए जनहित याचिकाओं की इजाजत देता है। लेकिन जीएम विरोधी कार्यकर्ता ताकतवर लोगों और लाबियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अमेरिकी कोर्ट तो इस विचार को ही हास्यास्पद मानता कि कि जीएम फूड अमेरिकियों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है। भारत के सुप्रीम कोर्ट को भी इसी राह पर चलना चाहिए।
 
- स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर (टाईम्स आफ इंडिया से साभार)
पूर्व प्रकाशित, अक्टूबर 29, 2012