स्कूलों को नहीं छात्रों को दे फंडः नीसा

- शिक्षा का अधिकार कानून ही बन रहा शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा
- आरटीई के दोषपूर्ण उपनियमों के कारण 1 लाख से अधिक स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा, 2 करोड़ से  ज्यादा छात्रों का भविष्य दाव पर

गैर सहायता प्राप्त (अनएडेड) निजी स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलाएंस (नीसा) ने शिक्षा का अधिकार कानून की तमाम विसंगतियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी मुहीम छेड़ने की योजना बनाई है। योजना की शुरूआत चंडीगढ़ से होगी जहां देशभर से जुटे स्कूल एसोसिएशन्स और स्कूल संचालक तीन दिनों तक बैठक करेंगे और आगे की रणनीति तैयार करेंगे। इस दौरान बजट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को और बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित और प्रशिक्षित भी किया जाएगा। तीन दिवसीय बैठक में उठने वाले मुद्दों व समस्याओं को लेकर प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों, शिक्षामंत्रियों सहित केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से मुलाकात की जाएगी और समाधान का आग्रह किया जाएगा।

शुक्रवार को चंडीगढ़ में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में नीसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने सरकार से स्कूलों की बजाए सीधे छात्रों को फंड देने की मांग की। उन्होंने कहा कि शिक्षा के अधिकार की बजाए बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा तभी संभव हो सकता है जबकि सरकार स्कूलों को फंड न देकर सीधे छात्रों को वाऊचर के माध्यम से फंड उपलब्ध कराए। जब छात्र स्वयं स्कूल की फीस भरने में सक्षम होगा तभी उसे अपने पसंद की स्कूल में दाखिला लेने की आजादी मिलेगी। इस स्थिति में स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और गुणवत्ता में सुधार देखने को मिलेगा।

संवाददाता सम्मेलन के दौरान नीसा के राष्ट्रीय सचिव व अग्रणी थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के प्रेसीडेंट पार्थ जे शाह ने कहा कि निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से लाया गया शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) ही छात्रों की शिक्षा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बन गया है। उन्होंने कहा कि आरटीई कानून के कई उपनियम अत्यंत दोषपूर्ण हैं। इन दोषपूर्ण उपनियमों और विसंगतियों के कारण देशभर में 1 लाख से अधिक स्कूलों पर तालाबंदी का खतरा उत्पन्न हो गया है। पार्थ ने कहा कि इससे उन 2 करोड़ से ज्यादा ऐसे गरीब बच्चों का भविष्य़ प्रभावित होगा जिन्होंने सरकारी स्कूलों की निशुल्क शिक्षा की बजाए निजी स्कूलों में पैसे चुकाकर दाखिला लेने को वरीयता दी थी।

इस दौरान नीसा के उपाध्यक्ष राजेश मल्होत्रा ने सरकार पर शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर संजीदा न होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि स्कूलों को मान्यता प्रदान करने के लिए बिल्डिंग, खेल के मैदान, अध्यापकों की शैक्षणिक योग्यता और वेतन आदि तमाम चीजों की बातें की जाती हैं लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर कोई बात नहीं की जाती।
कोषाध्यक्ष एस.मधुसूदन ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान स्कूलों को मान्यता देने के लिए आवश्यक अर्हता में लर्निंग आउटपुट को अन्य चीजों पर तरजीह दी। इससे अधिकांश समस्याओं का समाधान हो गया। स्कूलों को मान्यता प्रदान करने का यह एक श्रेष्ठ और सफल तरीका है। लेकिन देश के अन्य राज्य और यहां तक कि स्वयं केंद्र की मोदी सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा भी इस सफल मॉडल की अनदेखी की जा रही है।

नीसा की उपाध्यक्ष (गुणवत्ता) एकता सोधा ने बताया कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता, निजी स्कूलों की गुणवत्ता के आगे कहीं नहीं ठहरती। तमाम सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की रिपोर्ट में यह बात साबित भी होती है। यही कारण है कि बच्चों के भविष्य को लेकर जागरूक अभिभावक मुफ्त शिक्षा व्यवस्था होने के बावजूद निजी स्कूलों में पैसे देकर बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं।

संवाददाता सम्मेलन के दौरान दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगना, सहित 20 राज्यों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

- आजादी.मी