आरटीई: शिक्षा नहीं कानून का अनुपालन है सरकारों की प्राथमिकता

आज से ठीक पांच साल पहले १ अप्रैल २०१० को 'शिक्षा का अधिकार' क़ानून ८६वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा की गारंटी दी जाय। इस क़ानून के लागू होने के बाद शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की यह जवाबदेही तय हो गयी कि वो 6 से 14 साल के प्रत्येक बच्चे की शिक्षा सुनिश्चित कर सके। प्रथम दृष्टया जब इस  कानून और  इसके उद्देश्यों को देखते हैं तो बेहद आदर्श स्थिति नजर आती है। ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने की दिशा में यह क़ानून परिवर्तनकारी साबित होगा। लेकिन आज शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के पांच साल बाद जब इसके उद्देश्यों के मापदंडों पर इस क़ानून का मूल्यांकन करते हैं तो स्थिति पहले से बदतर नजर आती है। गहराई से देखने पर ऐसा लगता है कि यह क़ानून शिक्षा को सुलभ बनाने की बजाय और दुरूह बना रहा है। जिस क़ानून को बच्चों को शिक्षा के अधिकार के रूप में दिया गया वही कानून उन्हें शिक्षा से वंचित करता नजर आ रहा है। आइये जानते हैं क्या है इस क़ानून में खोट और कहाँ पैदा हो रही हैं दिक्कतें ?

कानूनी बाध्यताओं में उलझी शिक्षा

इस क़ानून का उद्देश्य शिक्षा देना था लेकिन इसमें सभी स्कूलों की मान्यता होना अनिवार्य कर दिया गया। इस क़ानून के तहत बिल्डिंग कोड भी बना दिया गया जिसके तहत यह तय कर दिया गया कि पांचवी तक ८०० वर्ग मीटर और मिडिल स्कूल के पास १००० वर्ग मीटर की जगह और तय संख्या में कमरे आदि संसाधन अनिवार्य तौर पर होना चाहिए, वरना मान्यता नही मिलेगी। आश्चर्य की बात यह है कि ये सारे नियम उन स्कूलों के लिए भी अनिवार्य कर दिए गये जिन्हें सरकार की तरफ से वित्तीय मदद नही मिलती है। इस क़ानून के तहत यह भी प्रावधान रख दिया गया कि जो स्कूल इस क़ानून के लागू होने से पहले से चल रहे हैं उनको भी आरटीई के नियामकों का पालन करना होगा। अत: जो स्कूल पहले से चल रहे हैं उनके लिए इस क़ानून की शर्तों को मानना बेहद मुश्किल है।

इसमें कोई शक नही कि बहुतायत स्कूल छोटे-छोटे मुहल्लों में, गलियों में, मकानों आदि में लम्बे समय से चल रहे हैं और स्थानीय सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर शिक्षा दे रहे हैं, इन स्कूलों पर आरटीई का डंडा चलने की वजह से बंद होने की नौबत आ गयी है। ३१ मार्च-२०१६ को ही दिल्ली में ८०० ऐसे स्कूलों की मान्यता रद्द होने की खबर मीडिया में आई है। ये स्कूल उन इलाकों में हैं जहाँ या तो सरकारी स्कूल पर्याप्त नही हैं अथवा इन बच्चों के पास कोई और विकल्प नही है। अब सवाल है कि क़ानून से स्कूल तो बंद किया जा सकता है लेकिन क्या कोई क़ानून इन स्कूलों में पढ़ रहे लाखों की संख्या में बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था भी कर रहा है ? ऐसे में अब सवाल है कि शिक्षा के अधिकार क़ानून की आड़ में स्कूलों की मान्यता रद्द करके भला हम सभी बच्चों की शिक्षा को कैसे सुनिश्चित कर लेंगे ?

अपनी जवाबदेही प्राइवेट स्कूलों पर डालती सरकार

शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत सरकार का यह दायित्व बनता है कि वो प्राथमिक स्तर की शिक्षा सभी बच्चों को मुफ्त उपलब्ध कराने की व्यवस्था करे। लेकिन आश्चर्य है कि सरकार द्वारा ऐसा करने के बावजूद अभिभावक अपन बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने को तैयार नही हैं। कारण ? कारण सिर्फ गुणवत्ता है! कानूनी उलझनों में शिक्षा को उलझा कर कहीं न कहीं इसके गुणवत्ता के साथ समझौता किया गया है, जिसकी वजह से अभिभावकों का सरकारी स्कूलों से मोह भंग हुआ है। अब चूँकि लोग मुफ्त की खराब शिक्षा की बजाय पैसे देकर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं तो वहां भी आरटीई का क़ानून एक मुसीबत पैदा कर रहा है। इस क़ानून में यह प्रावधान है कि प्राइवेट स्कूल २५ फीसद सीट गरीब बच्चों की मुफ्त शिक्षा के लिए आरक्षित रखेंगे। ऊपर से प्रावधान यह कि अगर वो पचीस फीसद सीट न भरे तो उसे खाली रखा जाय! अर्थात बेशक देश का कोई बच्चा सीट न हो पाने की वजह से दाखिला न ले पाए लेकिन उस २५ फीसद को कोटे के हिसाब से खाली रखा जाय। और तो और उन खाली सीटों के लिए सरकार की तरफ से कोई प्रतिपूर्ति (रिम्बर्समेंट) भी नहीं दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि एक दो अपवादों को छोड़ दिया जाए तो पूरे देश में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित २५ फीसद सीटों के ऐवज में मिलने वाली प्रतिपूर्ति का कोई अता पता नहीं है। स्कूल संचालक अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं।

अब सोचिये, यह कैसा दोहरापन है कि जब सरकारें अपने स्कूलों में तो बेहतर शिक्षा दे पाने में पूरी तरह से नाकाम हुई है तो प्राइवेट स्कूलों को मुफ्त शिक्षा देंने के लिए क़ानूनन बाध्य करने लगी है। हालांकि देखें तो कानून के मुताबिक़ मुफ्त शिक्षा देने की जवाबदेही तो सरकार की थी, फिर उसने पचीस फीसद बच्चों की जिम्मेदारी निजी स्कूलों के ऊपर क्यों डाल दी ? कहीं न कहीं यह यह दर्शाता है कि अपनी जिम्मेदारी निभा पाने में पूरी तरह से असफल होने के बाद अब इस क़ानून के जरिये प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा को भी खराब करने की कोशिश की जा रही है।

किसको लाभ पहुंचा रहा यह क़ानून ?

बिल्डिंग कोड, इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि की बाध्यता लागू करने से छोटे स्कूल तो बंद होने की स्थिति में हैं लेकिन बड़े और पूजीपतियों के स्कूलों पर इसका कोई असर नही है। चूँकि उनको मान्यता लेने में भी दिक्कत नही है। उनके पास प्रॉपर्टी की भी कोई समस्या नही है। उनकी सरकारी तंत्र में पहुँच भी अच्छी है और सबसे बड़ी बात उनकी फीस भी इतनी ज्यादा है कि वे इन संसाधनों को एफोर्ड भी कर पा रहे हैं। लेकिन पांच कमरों में चल रहा एक छोटा स्कूल जिसकी फीस पचास से चार सौ रूपये तक है, भला कैसे इन शर्तों को अपने स्कूल लागू कर पायेगा ? लिहाजा उसके पास इन स्कूलों को बंद करने के सिवा कोई चारा नही है। इस देश की परम्परा में तो एकल स्कूल तक चलाने की आजादी रही है, लिहाजा स्कूलों को कानूनी जकड़नो में बांधना कहीं न कहीं भारतीय शिक्षा की मूल परम्परा के खिलाफ जाकर शिक्षा को उद्द्योगपतियों के हवाले करने जैसा है। छोटा और सामान्य व्यक्ति आरटीई क़ानून के तहत स्कूल चला ही नहीं सकता है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक एम.जी वैद्य ने अपने एक लेख में इसबात का जिक्र किया है कि पचास के दशक के उपरान्त बालासाहब देशपांडे नाम के एक सरकारी अधिकारी ने तबके सर संघचालक गुरुजी से प्रेरणा लेकर वनवासी कल्याण आश्रम के तहत एकल स्कूलों का प्रकल्प चलाया। आज की तारीख में गरीब तबके के बच्चों के लिए पचास हजार से ज्यादा एकल स्कूल छोटे स्तर पर चल रहे हैं। क्या आरटीई के तहत ऐसे हजारों स्कूलों को बंद करके ही शिक्षा को सुनिश्चित करना समाधान है ?

आरटीई के बाद शिक्षा में बदलाव

शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने से पहले और लागू होने के बाद शिक्षा की स्थिति में कैसा बदलाव हुआ है, इसका मूल्यांकन किया जाना जरुरी है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी और आज़ादी.मी द्वारा जारी एक आंकड़े में बताया गया है कि २०१० में जब यह क़ानून लागू किया गया तब सरकारी स्कूल के 65.5  फीसद और प्राइवेट स्कूलों के 76.2 फीसद बच्चे फर्स्ट लेवल की किताबों को ढंग से पढ़ पाने में सक्षम थे। लेकिन वर्ष 2011, 2012,2013 और 2014 में क्रमश: यह आंकड़ा सरकारी स्कूलों के बच्चों में कम होता गया जबकि प्राइवेट स्कूलों में यह औसतन स्थिर रहा। क्रमश: सरकारी स्कूलों के सन्दर्भ में यह आंकड़ा 2014 में गिरकर 65.5 से 49.2 फीसद तक पहुंच चुका है जबकि प्राइवेट स्कूल में यह आंकड़ा 2014 में 73.1 है। ये आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद सरकारी स्कूलों की शिक्षा के गुणवत्ता में लगातार कमी आई है जबकि प्राइवेट स्कूल बेहतर किये हैं।  वही अगर सरकार द्वारा शिक्षा पर व्यय के मामले में पड़ताल करें तो वर्ष 2011-12 एवं वर्ष 2014-15 में गुजरात को छोड़कर तमाम राज्यों में शिक्षा पर सरकार द्वारा व्यय 48 फीसद से 150 फीसद तक की वृद्धि हुई है, जबकि गुजरात में इस मद में होने वाले खर्च में 15 फीसद की कमी हुई है। बावजूद इसके शिक्षा की गुणवत्ता इन राज्यों  की तुलना में गुजरात की अच्छी है। अब सवाल है कि इन आंकड़ों के बाद क्या शिक्षा के अधिकार कानून के औचित्य पर बहस नही होनी चाहिए ?

गुजरात मॉडल से क्यों सीख लेने की जरुरत 

स्कूल च्वाइस पर काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी एवं आजादी.मी द्वारा जारी आंकड़ों में यह बात सामने आई है कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद गुजरात सरकार ने स्कूलों को मान्यता देने को लेकर जो मानक तय किये वो सभी राज्यों की तुलना में सबसे बेहतर मॉडल माना गया है। वहां मान्यता के लिए बिल्डिंग आदि को कम तरजीह देते हुए इसबात पर ज्यादा तरजीह दी गयी कि अमुक स्कूल की शिक्षा में गुणवत्ता कैसी है! अगर गुणवत्ता ठीक है तो बाकी शर्तों में गुजरात सरकार ने थोड़ी राहत दे दी थी। परिणाम ये हुआ कि प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में गुजरात की स्थिति बाकी राज्यों की तुलना में अच्छी है। लिहाजा निष्कर्ष यह है कि हम सारे नियम यदि शिक्षा देने के लिए ही बना रहे हैं तो उस प्रणाली को क्यों न अपनाएँ जिससे कि शिक्षा सहज, सुलभ और गुणवत्तायुक्त हो। शिक्षा की गुणवत्ता को केंद्र में न रखते हुए बाक़ी कानूनी प्रावधानों को मानक बनाने की वजह से कहीं न कहीं हम उन लाखों बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे है जिनकी शिक्षा का भविष्य उन छोटे-छोटे स्कूलों पर टिका है जो देश के गली-मुह्ल्ल्लों में चल रहे हैं।

अब जब शिक्षा के अधिकार कानून के पांच साल हो गये हैं तो इस बात का मूल्यांकन करना जरुरी है कि जिन उद्देश्यों के लिए इस क़ानून को लाया गया उन उद्देश्यों की पूर्ति में यह क़ानून कितना असफल अथवा सफल रहा है ? अगर इस क़ानून ने कामयाबी हासिल नही कि इसके औचित्य पर विचार जरुर होना चाहिए।

- शिवानन्द द्विवेदी
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं)