डीबीटी: आर्थिक सशक्तिकरण की पारदर्शी व्यवस्था

किसी व्यक्ति के सशक्त होने का व्यवहारिक मानदंड क्या है? इस सवाल के जवाब में व्यवहारिकता के सर्वाधिक करीब उत्तर नजर आता है- आर्थिक सक्षमता। व्यक्ति आर्थिक तौर पर जितना सम्पन्न होता है, समाज के बीच उतने ही सशक्त रूप में आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। निश्चित तौर पर आर्थिक मजबूती के लिए अर्थ को अर्जित करना ही पड़ता है। भारतीय अर्थ परम्परा में धर्म और अर्थ को परस्पर पूरक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए महर्षि चाणक्य ने भी कहा है- धर्मस्य मूलम अर्थम्। यानी, धर्म के मूल में अर्थ अनिवार्य तत्व है।

ऐसी स्थिति में भारत में जब गरीबी एक समस्या की तरह आज भी मुंह बाए खड़ी है, तो इसके पीछे आर्थिक निशक्तता अर्थात विपन्नता ही मूल वजह है। स्वतंत्रता के पश्चात समाजवादी अर्थनीति पर देश के अर्थतंत्र को आगे ले जाने का जो निर्णय प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने किया था, उसे तबके नेहरूवियन विचारकों ने लोक कल्याणकारी राज्य के रूप भारत की दशा-दिशा तय करने का कारगर हथियार बताया था। भारत में आजादी के लंबे समय बाद तक लोक कल्याण की नीतियों को राज्यों ने अपने ढंग से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की। चाहें सब्सिडी का मसला हो अथवा किसी भी किस्म की आर्थिक मदद का मामला हो। लेकिन आर्थिक सहायता के नाम पर जो धन राजकोष से जरुरतमंदों के लिए भेजा गया वह उनतक ठीक ढंग से पहुंचा नहीं, यह एक सामान्य रूप स्वीकार्य तथ्य है। खुद पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्वीकार किया था कि जरूरतमंदों के लिए केंद्र से जो 1 रुपया भेजा जाता है, वह लाभार्थी तक पहुंचते पहुंचते 15 पैसा हो जाता है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर वो 85 पैसा जाता कहाँ था? अगर लोक कल्याण के लिए जनता को भेजी गयी राशि उसे मिलेगी नहीं तो उसकी आर्थिक विपन्नता का उन्मूलन कैसे होगा? ऊपर से नीचे तक 85 पैसा पचा जाने वाला जो तंत्र था, वही देश के करोड़ो गरीबों के आर्थिक सम्पन्नता में लंबे समय तक रुकावट बना रहा। यह समस्या सिर्फ सरकारी योजनाओं में ही नहीं थी बल्कि जनता को दिए जाने वाले तमाम आर्थिक सहायताओं से भी जुड़ी थी।

देश की जनता के लिए दिया जाने वाला धन उन्हें शत-प्रतिशत मिले, इसका सर्वाधिक व्यवहारिक उपाय सिर्फ यही था कि जहाँ से पैसा दिया जाए और जिसको दिया जाए, के बीच सीधा विनिमय हो। यानी जनता का लाभ, सीधे जनता के हाथ में जाए। वर्ष 2014 में भाजपानीत सरकार बनने के बाद इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुआयामी प्रयास शुरू किये। भारत जैसे देश के लिए इस प्रणाली का उपयोग करना 2014 तक अत्यंत ही कठिन था। कठिन इसलिए था क्योंकि देश में बीस करोड़ से ज्यादा ऐसे निम्न मध्यम वर्ग के लोग थे, जिनके पास बैंक के खाते तक नहीं थे। देश की मुख्यधारा के अर्थतंत्र में उनकी कोई उपस्थिति नहीं थी। ऐसी स्थिति में डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर की प्रणाली अव्यवहारिक तो थी ही, असफल भी होनी थी।

लेकिन केंद्र की भाजपानीत सरकार ने जनधन योजना के माध्यम से बीस करोड़ से अधिक लोगों को बैंक से जोड़ने की सफल मुहीम चलाई। इसका नतीजा यह हुआ कि “डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर” की राह आसान हुई। चाहें रसोई गैस की सब्सिडी हो, यूरिया सब्सिडी हो, छात्रवृति हो अथवा राजकोष से आम लोगों को दिए जाने वाले किसी भी लाभ का मुद्दा हो, जनता का हक़ सीधे उनके बैंक खातों में पहुँचने लगा। आज डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर देश में पारदर्शी अर्थतंत्र के निर्माण और राज्य द्वारा नागरिकों को दिए जाने वाले लाभों के माध्यम से उन्हें आर्थिक मजबूती प्रदान करने का एक कारगर माध्यम बन रहा है। वर्तमान केंद्र सरकार अधिक से अधिक क्षेत्रों में इसका उपयोग करने की दिशा में लगातार काम करती दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक आंकड़ा प्रस्तुत करते हुए अनेक बार बताया है कि डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर को चलन में लाने से न सिर्फ लाभार्थियों को उनके हक़ का पूरा पैसा मिला है, बल्कि 57000 करोड़ रुपए की बचत भी सरकारी खजाने को हुई है। निश्चित तौर पर यह 57000 हजार करोड़ रुपये बिचौलियों के भ्रष्टाचार की भेंट ही चढ़ते होंगे। डीबीटी से जुड़ी भारत सरकार की वेबसाईट (https://dbtbharat.gov.in/) पर जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 में 54000 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि इसके अंतर्गत हस्तांतरित की गयी हैं। डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर का इस्तेमाल 56 मंत्रालयों की 393 योजनाओं में किया जाना है। वेबसाईट पर जारी आंकड़ों के अनुसार लागू डायरेक्ट बेनिफीट ट्रांसफर योजना लागू होने के बाद से अबतक 2,36,946 करोड़ रुपए लोगों के खातों में भेजे जा चुके हैं।

उपर दिए आंकड़ों के आधार पर विविध पक्षों का विचार करते हुए यदि डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर का मूल्यांकन करें तो दो महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। पहला, इस प्रणाली को व्यवहार में लाए जाने से राजकोष द्वारा नागरिकों को प्रदान किए जाने वाले लाभ में पारदर्शिता आई है। दूसरा, लाभ की राशि सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुँचने से उनकी आर्थिक स्थिति में मजबूती का आना स्वाभाविक है। गरीबी के पीछे आर्थिक विपन्नता के जाले को हटाने और आर्थिक रूप से जरुरतमंदों को सशक्त करने में भविष्य में यह प्रणाली और उपयोगी सिद्ध होगी। ऐसा अनुमान वर्तमान में इसके मिल रहे लाभों एवं इसके व्यवहारिक दृष्टिकोण को देखते हुए समीचीन प्रतीत होता है।

नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री एवं मौद्रिक नीतियों पर शोध करने वाले मिल्टन फ्रीडमैन डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर को सर्वाधिक व्यवहारिक एवं लोक कल्याण के लिए उपयोगी तरीके के रूप में प्रस्तुत किया था। यह व्यवहारिक इसलिए भी है क्योंकि जब आपका धन आपके हाथ में होता है तो आपके पास उस धन को खर्च अपनी वरीयता की जरूरत एवं पसंद के अनुरूप खर्च करने की स्वतंत्रता होती है। किस व्यक्ति के लिए धन खर्च करने की क्या प्राथमिकता है, यह उसके अलावा अगर कोई अन्य तय करे तो शायद वह उतना उपयोगी नहीं होगा, जितना उस धन का मालिक स्वयं अपनी पसंद से खर्च करे। समाजवादी अर्थनीति की यह एक बड़ी कमी रही है कि वह व्यक्ति के निजी जरूरत एवं पसंद अथवा नापसंद को तरजीह न देकर सामूहिकता में संसाधन देने के लिए राज्य व्यवस्था का उपयोग करता है। किसी ऐसे व्यक्ति जिसे भोजन की आवश्यकता हो उसे राज्य व्यवस्था भोजन मुहैया कराए, इससे बेहतर है कि उसे भोजन के लिए जरुरी धन मुहैया करा दे। धन मुहैया कराने का लाभ यह होगा कि भूखा व्यक्ति भोजन के अपनी पसंद का कर सकेगा। अर्थात, व्यक्ति की निजी पसंद, नापसंद और चयन की स्वतंत्रता की दृष्टि से भी यह व्यवस्था अत्यधिक उपयोगी नजर आती है। सेवा क्षेत्र के अनेक ऐसे उपक्रम हैं जहाँ डायरेक्ट बेनफिट ट्रांसफर को अगर लागू किया जाए तो देश को न सिर्फ एक पारदर्शी अर्थव्यवस्था प्राप्त होगी बल्कि आर्थिक स्वावलंबन के मामले में भी उचित लक्ष्यों को हासिल करते हुए हम लोगों को आर्थिक रूप से सशक्त बना पायेंगे।

- शिवानन्द द्विवेदी (लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं)

शिवानंद दिवेदी

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