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एक अप्रैल 2010 को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून 86वें संशोधन के तहत लागू किया गया था। इस क़ानून को लागू करने के पीछे मुख्य उद्देश्य यही था कि छह वर्ष से चौदह वर्ष तक के बच्चों की मुफ्त शिक्षा को सुनिश्चित किया जाये। इस क़ानून से शिक्षा प्राप्त करना न सिर्फ हर बच्चे का अधिकार बना बल्कि सरकार की भी जवाबदेही तय हो गयी।

प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि सबको शिक्षा मुहैया कराने की दिशा में यह क़ानून परिवर्तनकारी साबित होगा। लेकिन आज शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने के छह साल बाद जब इसके उद्देश्यों के मापदंडों पर इस क़ानून का मूल्यांकन करते हैं तो स्थिति उलट नजर आती है। वैसे तो क़ानून का उद्देश्य शिक्षा मुहैया कराना था लेकिन इसमें सभी स्कूलों की मान्यता होना अनिवार्य कर दिया गया। इस क़ानून के तहत बिल्डिंग कोड भी बना दिया गया जिसके तहत यह तय कर दिया गया कि पांचवीं तक 800 वर्ग मीटर और मिडिल स्कूल के पास 1000 वर्ग मीटर की जगह और तय संख्या में कमरे आदि संसाधन अनिवार्य तौर पर होने चाहिए।

आश्चर्य की बात यह है कि ये सारे नियम उन स्कूलों के लिए भी अनिवार्य कर दिए गये जिन्हें सरकार की तरफ से वित्तीय मदद नहीं मिलती। इस क़ानून के तहत यह भी प्रावधान रख दिया गया कि जो स्कूल इस क़ानून के लागू होने से पहले से चल रहे हैं, उनको भी आरटीई के नियामकों का पालन करना होगा। बहुतायत स्कूल छोटे-छोटे मोहल्लों में, गलियों में, मकानों आदि में लम्बे समय से चल रहे हैं और स्थानीय सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर शिक्षा दे रहे हैं। इन स्कूलों पर आरटीई का डंडा चलने की वजह से बंद होने की नौबत आ गयी है। 31 मार्च-2016 को ही दिल्ली में 800 ऐसे स्कूलों की मान्यता रद्द होने की खबर मीडिया में आई है। अब सवाल है कि क़ानून से स्कूल तो बंद करा जा सकता है लेकिन क्या कोई क़ानून इन स्कूलों में पढ़ रहे लाखों की संख्या में बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था भी कर रहा है?

अब चूंकि लोग पैसे देकर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं तो वहां भी आरटीई का क़ानून एक मुसीबत पैदा कर रहा है। इस क़ानून में यह प्रावधान है कि प्राइवेट स्कूल 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों की मुफ्त शिक्षा के लिए आरक्षित रखेंगे। ऊपर से प्रावधान यह कि अगर वो 25 फीसदी सीटें न भरें तो उसे खाली रखा जाये! अब सोचिये, यह कैसा दोहरापन है कि जब सरकारें अपने स्कूलों में बेहतर शिक्षा दे पाने में पूरी तरह से नाकाम हुई हैं तो अब प्राइवेट स्कूलों को मुफ्त शिक्षा देने के लिए क़ानूनन बाध्य करने लगी हैं।

गौर करने वाली बात है कि सौ-दो सौ की फीस में चलने वाले कम संसाधन वाले लो-बजट स्कूल के छोटे स्कूल इस कानून को अगर लागू करें तो वे इसको चला कैसे पायेंगे ? क़ानून के मुताबिक़ तो मुफ्त शिक्षा के प्रति पहली जवाबदेही सरकार की है, लिहाजा सरकार को सोचना चाहिए कि आखिर क्यों वो इस काम को कर पाने में असफल हो रही है? बिल्डिंग कोड, इन्फ्रास्ट्रक्चर आदि की बाध्यता लागू करने से छोटे स्कूल तो बंद होने की स्थिति में हैं लेकिन बड़े और पूंजीपतियों के स्कूलों पर इसका कोई असर नहीं है। लेकिन पांच कमरों में चल रहा एक छोटा स्कूल जिसकी फीस पचास से चार सौ रुपये तक है, भला कैसे इन शर्तों को अपने स्कूल पर लागू कर पायेगा? लिहाजा उसके पास इन स्कूलों को बंद करने के सिवा कोई चारा नहीं है।

मूल्यांकन जरूरी है कि शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू होने से पहले और लागू होने के बाद शिक्षा की स्थिति में कैसा बदलाव हुआ है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी और आज़ादी.मी द्वारा एक अध्ययन के आधार पर यह बताया गया है कि 2010 में जब यह क़ानून लागू किया गया तब सरकारी स्कूल के 65.5 फीसदी और प्राइवेट स्कूलों के 76.2 फीसदी बच्चे फर्स्ट लेवल की किताबों को ढंग से पढ़ पाने में सक्षम थे। लेकिन वर्ष 2011, 2012, 2013 और 2014 में क्रमश: यह आंकड़ा सरकारी स्कूलों के बच्चों में कम होता गया और प्राइवेट स्कूलों में औसतन स्थिर रहा। क्रमश: सरकारी स्कूलों के सन्दर्भ में यह आंकड़ा 2014 में गिरकर 65.5 से 49.2 फीसदी तक पहुंच चुका है जबकि प्राइवेट स्कूलों में यह आंकड़ा 2014 में 73.1 है।

वहीं अगर सरकार द्वारा शिक्षा पर व्यय के मामले में पड़ताल करें तो वर्ष 2011-12 एवं वर्ष 2014-15 में गुजरात को छोड़कर तमाम राज्यों में शिक्षा पर सरकार द्वारा व्यय 48 फीसदी से 150 फीसदी तक किया गया है। जबकि गुजरात में 15 फीसदी कमी के साथ व्यय किया गया है। बावजूद इसके शिक्षा के स्तर में गुणवत्ता इन राज्यों की तुलना में गुजरात की अच्छी है। आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद गुजरात सरकार ने वहां मान्यता के लिए बिल्डिंग कोड आदि को कम तरजीह देते हुए इस बात को ज्यादा तरजीह दी कि अमुक स्कूल की शिक्षा में गुणवत्ता कैसी है! अगर गुणवत्ता ठीक है तो बाकी शर्तों में गुजरात सरकार ने छूट दे दी थी।

निष्कर्ष यह है कि हम सारे नियम यदि शिक्षा देने के लिए ही बना रहे हैं तो उस प्रणाली को क्यों न अपनाएं जिससे कि शिक्षा सहज, सुलभ और गुणवत्तायुक्त हो। इस बात का मूल्यांकन करना जरूरी है कि जिन उद्देश्यों के ए इस क़ानून को लाया गया, उन उद्देश्यों की पूर्ति में यह क़ानून कितना असफल अथवा सफल रहा है?

- शिवानंद द्विवेदी
(लेखक, श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के रिसर्च फेलो हैं)
साभारः दैनिक ट्रिब्यून

http://dainiktribuneonline.com/2016/04/%E0%A4%AC%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4...