पाबंदी लगाने से पहले दुनियां के चलन को भी देखें:चेतन भगत

कुछ कारण से आधिकारिक रूप से ऐसा माना जाता है कि भारतीयों को आमोद-प्रमोद से नफरत है। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे नेता अथवा अदालतें ऐसे आमोद-प्रमोद को खत्म करने संबंधी किसी फैसले पर एक पल भी नहीं सोचतीं। जब तक इरादा अच्छा हो तो हमें किसी भी मौज-मजे की चीज को कुचलने पर कोई आपत्ति नहीं होती। फिर चाहे उस फैसले से कुछ मूल्यवान हासिल न भी हो।

इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा शिकार शराब रही है। हम इसे मौज-मजे का पापपूर्ण रूप मानते हैं। हमें न जाने क्यों लगता है कि सरकार को इस पर यथासंभव लगाम लगानी चाहिए। फिर चाहे पूरी तरह पाबंदी ही क्यों न लगानी पड़े अथवा ऐसेे अजीब से नियम बना दे कि जिसके कारण पांच सितारा होटलों को अपने मिनी बार रातोंरात खाली करने पड़े। सुप्रीम कोर्ट का हाल का वह आदेश ऐसी ही विचित्रता की कगार पर है, जिसमें राजमार्गों से 500 मीटर के दायरे में शराब-बिक्री पर पाबंदी लगाई गई है। रातोंरात इसके कारण हजारों व्यवसाय चलने योग्य न रहे और लाखों लोग उनके जॉब खो देंगे। यह तो तब है जब इन व्यवसायों में मूर्खतापूर्वक यह भरोसा करके भारी पैसा लगाया गया कि- एक, भारत असली देश है, जहां नियम रातोंरात नहीं बदलते।

दो, यदि आपके पास उचित लाइसेंस है तो कोई आपको व्यवसाय करने से नहीं रोक सकता। तीन, भारत निवेश के लिए अच्छी जगह है। बेशक, वे लोग मूढ़ थे, जिन्होंने यह भरोसा किया कि सरकार तथा विधि व्यवस्था व्यवसायों की रक्षा करेगी। क्योंकि जहां हम ‘मेक इन इंडिया’ पर केंद्रित विज्ञापन बनाते हैं वहीं, एक बार बिज़नेसमैन पैसा लगा देता है तो यही विज्ञापन उसके लिए ‘मेक लाइफ हेल’ बन जाता है।

हालांकि, लगता ऐसा है कि फैसले का शिकार सिर्फ शराब बेचने और खरीदने वाले ही हुए हैं। चूंकि यह व्यवसाय ऐसा लगता है कि जो खुशी देते हैं, हमें लगता है कि इन्हें लताड़ना नैतिक रूप से सही है। बेशक, हमें उसके कारण होने वाले नुकसान में कोई रुचि नहीं है। जैसे : एक, विदेशों में भारत की बिज़नेस अनुकूल होने की छवि को नुकसान (इससे लगता है कि हम बनाना रिपब्लिक हैं, जो साप्ताहिक रूप से नियम बदल देंगे और आपके बिज़नेस को संरक्षण नहीं देंगे)।

दो, इससे सरकार के वित्तीय स्रोतों पर विपरीत असर पड़ता है, जो शराब के व्यापार से मिलने वाले टैक्स पर निर्भर होती है। इसका इस्तेमाल शिक्षा और स्वास्थ में होता ( हां, पापी शराब कई भारतीयों के स्वास्थ्य का बिल चुकाती है)।

तीन, यह अवैध अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती है, क्योंकि जिन्हें शराब चाहिए, वे तो इसका रास्ता खोज ही लेंगे। शराब पर पाबंदी अथवा सीमित बिक्री दुनियाभर में विफल रही है। यह तो रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और हाईवे पर काउंटर के नीचे से शराब बेचेने वाले ढाबों को बढ़ावा देता है। मजेदार बात तो यह है कि 500 मीटर के दायरे से वांछित लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा। यदि मेरे पास वाहन है तो 500 मीटर भीतर जाने के लिए मुझे आगे की यात्रा के लिए शराब खरीदने में दो मिनट से भी कम वक्त लगेगा। क्या आपको वाकई लगता है कि ऐसे नियम से कोई ड्राइवर शराब पीने से बचेगा? इस नियम में एक और मूर्खतापूर्ण बात जोड़ी गई है कि हाईवे पर शराब की दुकान का संकेत देेने वाला कोई बोर्ड नहीं लगाया जा सकता। यह महान विचार किसके दिमाग में आया? सर (या मैडम) क्या कभी आपने गूगल मैप के बारे में सुना है?

यह आपको आपके आसपास मौजूद हर दुकान की जानकारी दे देगा। इतना ही नहीं वहां जाने का सबसे नज़दीकी रास्ता भी बता देगा। आजकल ड्राइवरों के फोन पर यह मौजूद है। फिर जल्द ही सारे राजमार्गों पर उग आने वाले ऐसे होर्डिंग्स की बात ही क्या करना, जिसनें लिखा होगा ‘रिफ्रेशमेंट सेंटर, फलां फलां।’ वे शराब की बात नहीं करेंगे लेकिन, यह सुनिश्चित कर देंगे कि आप सही जगह पहुंच जाएं। नि:संदेह हाईवे अब मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहरों से भी गुजरते हैं और इनके नज़दीक के सैकड़ों मॉल और पांच सितारा होटलों को बिना कारण शराब बंदी लागू करनी पड़ेगी, जिससे पता चलता है कि नियम को विचारपूर्वक नहीं बनाया गया है। पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था, राजस्व, इससे जुड़े लोगों के रोजगार पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और सड़कों पर पीकर वाहन चलाने में कोई कमी नहीं आएगी।

पीकर चलाने वाले ड्राइवरों को राजमार्गों से दूर रखने के तरीके हैं : एक, पीकर चलाने वालों पर भारी जुर्माना और सजा और दो, शराब पीकर वाहन चलाना कितना खतरनाक है इस पर जोर देते हुए अभियान चलाना। सारी दुनिया में यही किया जाता है और कोई कारण नहीं है कि हम इसे न अपनाएं। इससे हम उन मुकम्मल पाबंदियों और रोक पर आते हैं, जो भारत हर हफ्ते घोषित करने के मूड में रहता है। क्या हमें ऐसे काले कानून लागू करने के पहले वैश्विक मानदंडों पर निगाह डालनी नहीं चाहिए? यदि भारत को दुनिया के विकसित, सभ्य और आधुनिक देशों में होने की चाहत है, तो क्या हम कुछ वैश्विक मानदंडों और चलन को नहीं अपना सकते? कई देशों में शराब की बिक्री पर बिल्कुल रोक नहीं है और फिर भी वे शराब पीकर ड्राइव करने की प्रवृत्ति पर बड़ी हद तक रोक लगाने में सफल रहे हैं। 500 मीटर जैसा नियम तो अराजकता ही पैदा करता है, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है और उल्लंघन करने वाले को नई प्रकार की मनमानी से एजडस्ट करने को प्रेरित करता है।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा मीडिया की मौजूदगी में बीयर पीते हुए लोगों से मिलते थे। हर क्षेत्र के वैश्विक सीईओ और अचिवर्स बाज़ मौकों पर एक-दो ड्रिंक ले लेते हैं और फिर भी काफी अच्छी तरह पेश आते हैं, इसलिए किसी बुराई के कारण मदिरा पान को पाप समझना ठीक नहीं है, कम से कम जहां तक आधुनिक लोक-व्यवहार का सवाल है। अब वक्त आ गया है कि भारत बड़ा होकर वैश्विक व्यवहार के करीब आए। पीकर ड्राइव करना गंभीर उल्लंघन है और आमतौर पर शराब का उपयोग मर्यादित होना चाहिए। शराब पीकर वाहन चलाने पर रोक का कानून होना चाहिए पर वे समझबूझ भरे होने चाहिए और इस तरह बनाए जाने चाहिए कि समस्या हल कर सकें। वे मनमाने व निरर्थक नहीं होने चाहिए। जल्दबाजी में ऐसे न बनाए जाएं कि लगे कि किसी ने कई ड्रिंक लेकर बनाए हैं।

- चेतन भगत (अंगरेजी के युवा उपन्यासकार)
साभारः दैनिक भास्कर
http://www.bhaskar.com/news/ABH-chetan-bhagat-article-in-dainik-bhaskar-...