सीएजी की रिपोर्ट से खुलासा: शिक्षा का अधिकार कानून है निष्प्रभावी, दे रहा भ्रष्टाचार को बढ़ावा

सभी बच्चोँ को निशुल्क व अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए लाए गए अधिनियम ‘फ्री एंड कम्पल्सरी एजुकेशन एक्ट-2009’, जिसे आमतौर पर आरटीई एक्ट के नाम से भी जाना जाता है, की खामिया अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगी हैं।

प्रथम द्वारा प्रकाशित एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2016 (एएसईआर 2016) में ही बताया गया था कि किस तरह से नया नियम आने के बाद बच्चोँ की अटेंडेंस और उनके सीखने के स्तर में गिरावट आई है। अब कम्प्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (सीएजी) की रिपोर्ट ने न सिर्फ प्रथम द्वारा जारी रिपोर्ट की पुष्टि की कर दी है बल्कि इस सर्वविदित राज पर से भी पर्दा उठा दिया है कि नए नियम ने किस तरह से अनियमितताओं भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है।

हालांकि रिपोर्ट में किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लिया गया है मगर इस बात के साफ संकेत दिए गए हैं कि कैसे बेहद चालाकी से नए नियमोँ के तहत बाबूशाही के लिए रास्ते खोले गए हैं। सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि सभी बच्चोँ को स्कूल तक ले जाने के जिस उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह नियम लागू किया गया था उसे पूरा कर पाने में यह सफल नहीं हो सका है।

सच तो यह है कि आरटीई एक्ट ने भ्रष्टाचार के नए रास्ते खोल दिए हैं, जैसे कि-स्कूलोँ को मान्यता देना, उसे रद्द करना, संसाधनोँ की खरीद आदि की स्वीकृति सम्बंधी नियम और गरीब तबके के बच्चोँ की फीस की प्रतिपूर्ति आदि। इनके बारे में जानते तो सभी थे लेकिन खुलकर कोई नहीं बोल रहा था। मगर अब इन तथ्योँ पर और पर्दा नहीं डाला जा सकता है।

अगर फीस की प्रतिपूर्ति यानि रीईम्बर्समेंट की बात करेँ तो आरटीई एक्ट के सेक्शन 12 के अनुसार वे सहायता रहित मान्यता प्राप्त स्कूल ही फीस का रीईम्बर्समेंट हासिल कर सकते हैं जिनके वहाँ 25% सीटेँ आर्थिक रूप से कमजोर तबके के बच्चोँ के लिए रिजर्व हैं। सीएजी की रिपोर्ट में कई मामलोँ में अधिक और अनियमित रीईम्बर्समेंट देने की बात कही गई है।

बिहार में, ऐसे 90 स्कूलोँ को 1.18 करोड़रूपये का रीईम्बर्समेंट दे दिया गया जिन्हेँ मान्यता प्राप्त नहीं है। मध्य प्रदेश में 303 गैर मान्यता प्राप्त स्कूलोँ को 1.01 करोड़ रूपये रीईम्बर्समेंट के तौर पर दे दिए गए। कर्नाटक में 124 स्कूलोँ को 80 लाख रूपये का अतिरिक्त रीईम्बर्समेंट दे दिया गया; इसके तहत उन खर्चोँ को शामिल कर दिया गया जिनके लिए रीईम्बर्समेंट देने की अनुमति ही नहीं है। उत्तराखंड में 14 मदरसों को 19 लाख रुपये का रीईम्बर्समेंट दे दिया गया जबकि आरटीई एक्ट के तहत धार्मिक शैक्षणिक स्कूलों को शामिल ही नही किया गया है। यह सब क्या बिना मिलीभगत के सम्भव हो सकता था?

देश में अब तक जितने भी भ्रष्टाचार के बारे में हम सुनते आ रहे हैं उसकी तुलना में इसे मामूली जरूर करार दिया जा सकता है। यह दलील भी दी जा सकती है कि सीएजी ने कुछ ही जिलोँ में जांच के आधार पर रिपोर्ट बनाई है। लेकिन कोई भी दलील इस बात को झुठला नहीं सकती है कि आरटीई एक्ट ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है।

ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमेँ कई योग्य स्कूलोँ को सिर्फ इसलिए रीईम्बर्समेंट नहीं मिला क्योंकि वे आवश्यक कागजी कार्यवाई पूरी नहीं कर पाए। सीएजी ने अपनी जांच में पाया कि कर्नाटक और मध्य प्रदेश में सम्बंधित प्राधिकारियोँ के बचत खातोँ में अनियमित रूप से पैसे रखे हुए हैं। अगर देश भर के स्कूलोँ में बात की जाए तो ऐसी शिकायतोँ की बाढ़ आ जाएगी जिनमेँ सिर्फ इसलिए रीईम्बर्समेंट देने में देरी की गई अथवा देने से इनकार कर दिया गया क्योंकि उन स्कूलोँ के पास कोई ऊंची सिफारिश नहीं थी।

सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक तमाम ऐसे स्कूल भी हैं जो बिना मान्यता के ही चल रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, छतीसगढ़ के दो जिलोँ में 70 स्कूलोँ की मान्यता रद्द करने की सिफारिश की गई थी जिनमे से सिर्फ 12 को ही अमान्य किया गया था। गुजरात के जिन जिलोँ की जांच की गई थी उनमेँ 2,502 स्कूल और केरल के 1,666 स्कूल बिना मान्यता के ही चल रहे थे। उत्तराखंड के एक जिले में 109 स्कूल बिना मान्यता के चल रहे थे। क्या बिना घूसखोरी के ऐसा हो पाना सम्भव है?

स्कूलोँ को मान्यता देने की शर्तोँ में कुछ आवश्यक संसाधनोँ की उपलब्धता और छात्र-शिक्षक अनुपात जैसे मानकोँ को आधार बनाया जाता है। हजारोँ स्कूल इसलिए बंद हो चुके हैं क्योंकि वे इन मानकोँ पर खरे नहीं उतर सके।

नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलायंस के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 में 4,000 से भी अधिक स्कूल बंद हो गए थे जबकि जनवरी व अक्टूबर 2016 के बीच (हालिया उपलब्ध आंकड़े) 3,300 स्कूल बंद हो चुके हैं।

इसका क्या यह मतलब है कि सारे मान्यता प्राप्त निजी व सरकारी स्कूल तय मानकोँ पर खरे उतरते हैं? आइये जानते हैं सीएजी की रिपोर्ट क्या कहती है: चंडीगढ़के एक सरकारी स्कूल की बिल्डिंग के बीम में क्रैक पाया गया, यानि कि यह बिल्डिंग सुरक्षित नहीं थी। त्रिपुरा में एक स्कूल वर्ष 2004 से एक आंगनबाड़ी सेंटर में चल रहा था तो एक अन्य स्कूल बांस के शेड में चलाया जा रहा था। पुंडुचेरी में 17 स्कूलोँ के पास कोई प्लेग्राउंड नहीं था तो एक अन्य स्कूल की क्लासेज एक जर्जर किचन में चलाई जा रही थी। तमिलनाडु में खंडहर हो चुके भवनों में स्कूल चल रहे थे। एक स्कूल की छत ऐस्बेस्टस की थी तो एक स्कूल में गलियारे में क्लास चल रही थी। उत्तर प्रदेश में 105 स्कूलोँ के पास कोई बिल्डिंग ही नहीं थी तो 403 स्कूलोँ के भवन खंडहर में तब्दील हो चुके थे।

आरटीई एक्ट के नियमोँ के अनुसार शिक्षक-क्षात्र का अनुपात 1:30 होना चाहिए, जो कि इस अधिनियम के लागू होने के बाद 3 वर्ष के भीतर पूरा कर लेना अनिवार्य है। यानि कि मार्च 2013 तक सभी स्कूलोँ में प्रत्येक 30 छात्रोँ के लिए 1 शिक्षक उपलब्ध होना चाहिए ताकि सभी बच्चोँ पर पूरा ध्यान दिया जा सके। साथ ही एक टीचर वाले स्कूलोँ को बंद करने का नियम भी लागू किया गया था।

अब असलियत जान लेते हैं: सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि कई राज्योँ में मानकोँ का पालन नहीं हो रहा है। छत्तीसगढ़में 2015-16 के बीच 14% प्राइमरी व 15% अपर प्राइमरी स्कूलोँ में शिक्षक-छात्र अनुपात बेहद खराब था। बिहार में तो यह अनुपात 50-60 छात्रोँ पर 1 शिक्षक का था। आंध्र प्रदेश में 16% अपर प्राइमरी व 5% प्राइमरी स्कूलोँ में छात्र-शिक्षक का अनुपात बेहद खराब था।

बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरयाणा, ओडिसा, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु में सिंगल टीचर वाले स्कूल भी चल रहे हैं। बिहार में जहाँ 1% स्कूल ऐसे पाए गए वहीं मध्य प्रदेश व आंध्र प्रदेश जैसे राज्योँ में ये आंकड़े 14-15% तक पाए गए।

इन सारी खामियोँ को देखते हुए क्या ऐसा कहा जा सकता है कि आरटीई एक्ट अपने उद्देश्योँ को पूरा कर पाने में सफल रहा है? क्या वह सभी बच्चोँ को स्कूल तक पहुंचा पाया है, क्योंकि यह उनका मौलिक अधिकार है?

युनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) व सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि प्राइमरी शिक्षा (कक्षा 1-5) में नामांकन लगातार घटते हुए वर्ष 2012-13 में 96 फीसदी के मुकाबले 2015-16 में 87.3% तक पहुंच गया। (एनईआर सम्बंधित राज्योँ के स्कूलोँ में होने वाला विभिन्न आयुवर्ग के तहत नामांकन रजिस्ट्री है)। अपर प्राइमरी (कक्षा 6-8) के एनईआर में भी गिरावट देखी गई है। वर्ष 2012-13 में यह 73.7% था और 2014-15 में घटकर 72.48% हो गया, हालांकि 2015-16 में यह बढ़कर 74.74% हो गया।

मगर सरकार बच्चोँ को स्कूल तक कैसे लेकर जाएगी जब उसे यह पता ही नहीं होगा कि स्कूल से बाहर कितने बच्चे हैं? सीएजी की रिपोर्ट बताती है कि अधिकतर राज्य सरकारोँ के पास यह यह जानकारी ही नहीं है कि उनके राज्य में ज़ीरो से लेकर 14 साल की उम्र के बच्चोँ की संख्या कितनी है, कौन स्कूल जा रहा है और कितने बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। आरटीई एक्ट की नियम संख्या 10 के मुताबिक बच्चोँ की संख्या की जानकारी हासिल करने के लिए सरकारोँ को नियमित रूप से हाउस-होल्ड सर्वे कराना चाहिए। लेकिन 21 राज्योँ ने इस तरह का सर्वे कराया ही नहीं।

सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करना एक आदर्श कदम है जिसकी ओर हर देश को निरंतर बढ़ते रहना चाहिए। लेकिन भारत इस मामले में कई ऐसे देशोँ से भी पीछे है जो आर्थिक रूप से हमसे काफी पीछे हैं। विश्व बैंक के ह्यूमन डेवेलपमेंट इंडेक्स के एजुकेशन इंडेक्स में भारत का रैंक 135 है, जो कि तजाकिस्तान, वानुअतु, ग्वाटेमाला, गुयाना और किर्गिस्तान आदि देशोँ से भी नीचे है। एजुकेशन इंडेक्स की गणना स्कूलिंग के औसत वर्ष और अनुमानित वर्ष को जोड़कर की जाती है। भारत में स्कूलिंग के औसत वर्ष हैं 6.3 जबकि तजाकिस्तान व किर्गिस्तान में 10 और गुयाना में 8.4 है। इस स्थिति में तो अनवरत विकास की सुनहरी कल्पना नहीं की जा सकती है।

राइट टु एजुकेशन के जरिए एक सुशिक्षित समाज की बेहतर नींव नहीं रखी जा सकती है। समीक्षक शुरुआत से ही यह कह रहे थे कि जो भी हो रहा है वह सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में इंस्पेक्टर राज को मजबूत बनाएगा और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगा। सीएजी की रिपोर्ट ने इसकी पुष्टि कर दी है।

- सीता
साभारः फर्स्ट पोस्ट

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