व्यंग्यः देर से चल रही ट्रेनों में अटके हैं अच्छे दिन!

टेलीविजन पर 'साफ नीयत सही विकास' के विज्ञापन को लगभग घूरते हुए पड़ोसी शर्मा जी बुदबुदाए- "हद है...क्या बकवास है। बंद करो इसे यार।" ज़िंदगी जिस तरह मेरे साथ दिन में कई बार मजाक करती है, मैंने सोचा थोड़ा मजाक शर्माजी के साथ कर लिया जाए। मैंने पूछा- "आपने विज्ञापन को बकवास कहा या टीवी को या मुझे। आपने टीवी को बंद करने के लिए कहा, विज्ञापन को या मुझे।" शर्माजी झुंझलाए। बोले-"अब तुम दिमाग का दही मत करो। वैसे ही 18 घंटे लेट घर पहुंचा हूं। दिमाग सही ठिकाने पर नहीं है।"

मैंने कहा कि 18 घंटे में बंदा आजकल अमेरिका पहुंच जाता है। आप कहां से चले थे कि 18 घंटे लेट हो गए ? शर्माजी बोले-"ट्रेन विलंब से थी।" मैंने कहा-"इसमें नया क्या था। यह ऐतिहासिक तथ्य है। हिन्दुस्तान में ट्रेन समय पर चलने लगे तो खबर है। विलंब से चले तो कोई खबर नहीं। यह बात उसी तरह से है कि कुत्ता आदमी को काट ले तो कोई खबर नहीं लेकिन आदमी कुत्ते को काट ले तो खबर है।"

शर्मा जी का दर्द उफन पड़ा। बोले-"कोलकाता में जहां से ट्रेन शुरु होनी थी, वहां कमबख्त ड्राइवर ने इतनी सीटियां दे दीं कि लगा पांच मिनट पहले ही रवाना हो लेगी। घुटनों में दर्द रहता है तो सीढ़ियां उतरने में वक्त लग गया। ट्रेन सरकने लगी तो मैं भागने लगा। लेकिन-इस दौड़ भाग में मैं अपने कोच तक नहीं पहुंच पाया। जनरल डिब्बे में घुस गया। सोचा कि अगले स्टेशन पर अपने डिब्बे में अपनी आरक्षित सीट पर पैर पसारकर सो जाऊंगा।"

कहानी में पहला मोड़ आया था। मेरी जिज्ञासा जागने लगी। मैंने कहा-"फिर" ?

शर्माजी बोले-" फिर क्या जी। मरते मरते बचा। गाना सुना था कि कोठे ऊपर कोठरी मैं उसमें रेल चला दूंगी। लेकिन मेरा तो हाल यह था कि रेल रेंग रही थी और आदमी एक दूसरे पर चल रहे थे। आदमी ऊपर आदमी। फिर औरत भी। फिर बच्चे भी। उसी पर बुजुर्ग भी। टॉयलेट तक पहुंचना उसी तरह दुश्कर हो गया, जैसे जिले के एक सामान्य कार्यकर्ता का आलाकमान तक पहुंचना। मैंने अपने जीवनबीमा निगम की रकम का कैलकुलेशन किया, बीवी-बच्चों को याद किया और दमघोंटू समाधि लेने को तैयार हो गया। सांस ने अंदर बाहर जाने से मना कर दिया था। भीतर की सांस उखड़ते हुए बोली-बाहर नहीं जाऊंगी। मेरा वीटो है।"

मैंने कहा-"यानी आपका हाल भी सरकार की योजनाओं सरीखा हो लिया था। लॉन्च हुई तो जोरशोर से लेकिन टाइम से कभी पूरी नहीं होती। वैसे, ही आपकी ट्रेन चली टाइम से लेकिन समय पर पहुंची नहीं।"

शर्मा जी ने कहा-"नहीं, मेरा हाल सरकारी योजनाओं से भी बदतर हो गया। सरकारी योजनाओं के कुछ लाभार्थी तो होते हैं। यहां तो हर लाभार्थी पीड़ित था। किसी के बच्चे चांय चांय कर रहे थे, कोई खुद ही सिर पकड़े बैठा था।"

मैंने सांत्वना देने की कोशिश की और योजनाओं को ही आधार बनाया। मैंने कहा-"कई सरकारी प्रोजेक्ट 30-30 साल से अधूरे हैं। लेकिन आपका प्रोजेक्ट कम से कम पूरा हो गया। 18 घंटे देर से सही लेकिन घर आ गए। वैसे भी आप तो सही सलामत हैं। कोई गड़बड़ नहीं दिख रही।"

वह बोले-"तुम्हें क्यों गड़बड़ दिखेगी। तुम यहां एसी में बैठे हो। मेरा स्मार्टफोन छिन गया। बटुए का अता पता नहीं। वो तो हजार-बारहसौ रुपए दूसरी जेब में थे और सीट नंबर याद था तो ट्रेन रुकते ही सीट पर पहुंच गया। "

मैंने कहा-"चलिए दिन ठीक नहीं था। जान बची तो लाखों पाए...वैसे, एक बार एसी डिब्बे में पहुंच गए, फिर क्या चिंता।"

वह बोले-"काहे का एसी डिब्बा। डिब्बे का एसी खराब था। लोग चीख रहे थे। बच्चे रो रहे थे। डिब्बा ट्रेन का कंपार्टमेंट कम जंतर मंतर का धरनास्थल ज्यादा दिख रहा था। कोई मंत्री को ट्वीट कर रहा था, कोई संत्री पर चिल्ला रहा था। दो चार युवा प्रदर्शनकारी बैनर बनाने में जुट गए थे कि मीडिया वाले किसी स्टेशन पर आ गए तो उन्हें लगना भी चाहिए कि कायदे का प्रदर्शन हुआ है। कुछ लड़के-लड़कियां प्रदर्शन के बीच सेल्फी ले रहे थे ताकि अपने दोस्त-रिश्तेदारों को बता सकें कि बेहद बुरे हालातों के बीच भी उन्हें अपना प्रथम कर्तव्य याद रहा।"  

"कोई नहीं। कभी कभी दिन ही खराब होता है। खाना-पीना तो हुआ न।" मैंने फिर सांत्वना जताते हुए पूछा।

अब वह भड़क गए। बोले-"भरी गर्मी में बंद एसी में 18 घंटे विलंब से चलती ट्रेन में हो हल्ले हंगामे के बीच खाने की याद किसे रहती है, और कौन खाना देता है? प्रदर्शन वाले डिब्बे में वेंडर कोई आया नहीं और गाड़ी जब भी किसी ढंग के स्टेशन पर रुकी तो पांच मिनट में चल दी लेकिन जब सन्नाटे में किसी जंगल में रुकी तो फिर शायद ड्राइवर को याद ही नहीं रहा कि ट्रेन चलानी भी होती है।"

मैंने कहा-कोई नहीं। आप सुरक्षित लौट आए। हमारे लिए यही बहुत है। वर्तमान रेल मंत्री का सारा ध्यान इसी बात पर है कि यात्री सुरक्षित लौट आएं। देर आएं लेकिन दुरुस्त आएं।

शर्मा जी बोले-और ट्रेन को वक्त पर चलाने का काम किसका है?

मैंने कहा-हमारे आपके जैसे लोग देश की जीडीपी में क्या योगदान दे रहे हैं? मक्खी घर में मारनी थी तो आपने ट्रेन में मार लीं। थोड़ा जल्दी आ ही जाते तो क्या देश की विकास दर 10 फीसदी पार कर जाती? इस देश में लोग पार्टियों में, बैठकों में, शादियों में देर से पहुंचते हैं ताकि उनकी अहमियत बनी रहे। 'अच्छे दिन' भी इसीलिए देर से आ रहे हैं ताकि उनकी अहमियत बनी रहे। मान लीजिए, सरकार बनते ही पहले ही दिन अच्छे दिन आ जाते तो कौन उनकी बात बार बार करता। मीडिया वाले क्यों लोड लेते। अब देखिए, हर वक्त जिक्र होता है कि अच्छे दिन नहीं आए, अच्छे दिन नहीं आए।

शर्मा जी कंफ्यूज होकर बोले-"तो क्या अच्छे दिन भी किसी ट्रेन में अटक गए हैं?"

मैंने कहा-बिलकुल। अच्छे दिन किसी ट्रेन में ही अटके हैं। अच्छे दिन की ट्रेन भी लेट है। वो ट्रेन कौन सी है-हमें नहीं पता। भारतवर्ष में देर से आने से अलग रौब पड़ता है। तो देर से आने के लिए रेलवे को कोसिए मत। आप सुरक्षित लौट आए-इसके लिए भारतीय रेल का धन्यवाद अदा कीजिए। एक ट्वीट कीजिए।

उन्होंने भी बात सुनी। नया स्मार्टफोन निकाला। रेल में ली अपनी सेल्फी संग रेलमंत्री को ट्वीट कर दिया- "शुक्रिया रेल मंत्री जी, 18 घंटे विलंब से सही मगर सही सलामत घर पहुंचाने के लिए आपका धन्यवाद।"

तभी न्यूज चैनल पर खबर फ्लैश हुई कि ट्रेनों को राइट टाइम चलाने और यात्रियों को समस्या से निजात दिलाने के लिए विभाग ने कसी कमर। अब ट्रेनों के रनिंग टाइम को ही बढ़ाने की तैयारी। शर्मा जी ने एक बार टीवी स्क्रीन को देखा और एक बार मुझे, फिर न जाने क्यों अपने बाल नोंचते वहां से निकल लिए।

- पीयूष पांडेय (लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार और धंधे मातरम् और छिछोरेबाजी का रिज्योल्य़ूशन नामक व्यंग्य संग्रह लेखक हैं)

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