"आप" का आभार

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे एक नई-बिलकुल नई इबारत लिख रहे हैं। इसलिए नहीं कि कांग्रेस दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में से कहीं भी सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो सकी, बल्कि इसलिए कि देश की राजधानी में आम आदमी पार्टी के उभार ने देश को एक नया संदेश दिया है। बमुश्किल एक साल पुराने दल-आप-की दिल्ली में अप्रत्याशित और उल्लेखनीय जीत पर शेष देश में जैसी प्रतिक्रिया हो रही है उससे यह तो साफ है कि आम जनता ने इस संदेश को ग्रहण कर लिया है, लेकिन यह कहना कठिन है कि राजनीतिक दल भी यह सही तरह समझ गए हैं कि उनके लिए अपने तौर-तरीकों में बदलाव करने का समय आ गया है। यह इसके बावजूद नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस, भाजपा समेत अन्य दलों के कई नेता आप की जीत से सबक सीखने की बात कह रहे हैं। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने यह दिखा दिया कि मूल्यों-मर्यादाओं के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए साफ-सुथरी राजनीति भी की जा सकती है और ऐसा करते हुए आम जनता का भरपूर समर्थन भी हासिल किया जा सकता है। नि:संदेह आप दिल्ली की सत्ता से दूर रह गई, लेकिन वह जिस तरह सारे अनुमानों को ध्वस्त करते हुए सरकार बनाने के करीब पहुंच गई उसका एक ही अर्थ है कि आम जनता जिस बेहतर विकल्प की तलाश में थी वह पूरी होती दिख रही है। दिल्ली में आप का उभार राष्ट्रीय राजनीतिक दलों कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ तीसरे-चौथे मोर्चे के नाम पर राजनीति करने वाले दलों के लिए भी खतरे की एक बड़ी घंटी हैं। वे चेत जाएं तो इससे सबसे अधिक हित उनका ही होगा। यदि इन चुनाव नतीजों के बाद राजनीति और चुनाव प्रक्रिया संबंधी सुधारों की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती तो इसका मतलब होगा कि मुख्य धारा के राजनीतिक दल अभी भी संभलने-सुधरने और आम आदमी की आवाज सुनने के लिए तैयार नहीं। आप के उभार के जरिये शेष राजनीतिक दलों को चेताने और देश में एक नई राजनीतिक उम्मीद जगाने के लिए दिल्ली की जनता और आप के नेताओं का आभार व्यक्त किया जाना चाहिए।

दिल्ली के साथ-साथ राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव नतीजे भी राष्ट्रीय राजनीति पर असर डालने वाले हैं। ये नतीजे कांग्रेस को पहले से ज्यादा पस्त और भाजपा को और उत्साहित करेंगे। यह सही है कि विधानसभा चुनावों के मुद्दे आम चुनावों के मुद्दों से भिन्न होते हैं, लेकिन उनमें राष्ट्रीय मुद्दे भी अपना कुछ न कुछ प्रभाव छोड़ते हैं और तब तो अवश्य ही जब वे जनता को त्रस्त करने वाले भ्रष्टाचार और महंगाई के रूप में हों। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि इन दोनों समस्याओं के विकराल रूप में अस्तित्व में बने रहने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार केंद्र सरकार है। चूंकि ये समस्याएं किसी न किसी स्तर पर केंद्रीय सत्ता के कुशासन को भी बयान करती रहीं इसलिए कांग्रेस चारों राज्यों में खेत रही। यदि मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह शानदार ढंग से जीते और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह हैटिक बनाने में कामयाब रहे तो इसका सीधा मतलब है कि इन राज्यों की जनता ने कांग्रेस के वायदों के बजाय इन नेताओं के काम पर भरोसा किया। राजस्थान में कांग्रेस की हार तय दिख रही थी, लेकिन इसकी उम्मीद शायद ही किसी को रही हो कि उसे इतनी बड़ी पराजय ङोलनी पड़ेगी। इसमें संदेह है कि कांग्रेस को यह समझ आएगी कि रियायतों की रेवड़ियां बांटकर चुनाव जीतने का दौर बीत चुका है। इसमें भी संदेह है कि वह मोदी के उभार के रूप में सामने आ खड़ी हुई चुनौती को सही परिप्रेक्ष्य में स्वीकारने का साहस जुटा पाएगा।

 

- साभारः दैनिक जागरण

 

 

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