आर्थिक चमत्कार के 20 वर्ष

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आज से 20 वर्ष पूर्व 21 जून 1991 को नरसिम्हा राव ने एक ऐसे कमजोर और अल्पसंख्यक सरकार की बागडोर संभाली थी, जो गंभीर आर्थिक संकट से घिरी थी। इसके बावजूद उन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया। भारत 1991 में इतना गरीब था और यहां की शासन व्यवस्था इतनी बदहाल थी कि यह विदेशी सहायता के लिए आवश्यक शर्तों को भी पूरा नहीं कर पा रहा था। आज भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए अमेरिका का भी सहयोग मिल रहा है और यह जल्द ही आर्थिक विकास की गति में चीन को भी पीछे छोड़ देगा।

जब आर्थिक सुधार कि प्रक्रिया आरम्भ हुई थी, तब कुछ आलोचकों ने आशंका जताई थी कि अन्तराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक की सलाह पर चलने के कारण जिस तरह अफ्रीका और लैटिन अकेरिका के कुछ देशों का विकास 1980 के दशक में अवरुद्ध हो गया था, कुछ वैसा ही भारत के साथ भी हो सकता है। आलोचकों का मानना था कि वित्तीय संयम बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और असुरक्षा को बढ़ावा देगा। आलोचकों को सोचना था कि अर्थव्यस्था को खोल देने से विदेशी कंपनियां भारतीय कारोबार को तबाह कर देंगी। आज ये तीनों आलोचनाएं आधारहीन साबित हुई हैं। 1990 का दशक चमत्कारी साबित हुआ है। सामाजिक और लोक कल्याणकारी कार्यों पर खर्च काफी बढ़ा है और भारतीय व्यापारियों ने देश में तो अपना अस्तित्व बरकरार रखा ही इसके साथ ही वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में भी तब्दील हो गए। पिछले दो दशकों में भारत की औसत जीडीपी वृद्धि दर 8 फीसदी एवं औसत बचत दर 22 फीसदी से बढ़ कर 34-36 फीसदी हो गई है।

थोड़ी सी विदेशी पूंजी के आगमन से भारत में निवेश की दर जीडीपी की 36-38 फीसदी पर पहुंच गई है। इससे जीडीपी विकास की दर 8-9 फीसदी बनी हुई है। प्रति व्यक्ति आय इन दो दशको में 300 डॉलर से बढ़ कर 1,700 डॉलर हो गई है। इस तीव्र विकाश से न सिर्फ कुशल श्रमिकों बल्कि अकुशल श्रमिकों की भी कमी हो गई है। प्रशिक्षित कर्मचारियों का वेतन तो बढ़ा ही अकुशल मजदूरों की मजदूरी भी बिहार और ओडिशा में पिछले साल 40 फीसदी बढी। तेज विकास से राजस्व की वसूली भी बढ़ी। केंद्रीय राजस्व में हर साल एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि हो रही है।

इस आर्थिक प्रगति से शिक्षा और स्वास्थ्य तथा जनकल्याणकारी योजनाओं (नरेगा, सर्व शिक्षा अभियान, भारत निर्माण) पर खर्च को बढ़ावा मिला है। हालांकि ये योजनाएं भ्रष्टाचार और अन्य समस्याओं से बुरी तरह जकड़ी हुई हैं। इन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है, जो भारत में असंभव प्रतीत होता है, क्योंकि आधे-अधूरे सुधार के कारण श्रम सुधार नहीं हो पाया है।

इसके बावजूद भारत ने कौशल-आधारित निर्यात जैसे, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, सेवा क्षेत्र, ऑटो और दवाई निर्माण में विकाश किया है। यह कौशल-आधारित रास्ता भारत के लिए बिलकुल नया था और यह अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के मॉडल पर भी आधारित नहीं था। यह विकास आर्थिक सुधारों के बाद नए तरीके से सोचने की आजादी मिलने के बाद हुआ। हालाँकि अब यह विकास भी कुशल लोगों की कमी की समस्या से जूझ रहा है और जिसे सुलझाने का प्रयास हमारी कमजोर शिक्षा व्यवस्था कर रही है।

भारत किफायती इंजीनियरिंग के क्षेत्र में दुनिया में सबसे आगे निकल चुका है। यह एक ऐसी अवधारणा है जो एक दशक पहले मौजूद नहीं थी। इसके कारण लागत मूल्य पश्चिमी देशों की तुलना में 10-15 फीसदी नहीं, बल्कि 50-90 फीसदी तक कम हो जाती है। इसका बहुत ही अच्छा उदहारण है विश्व की सबसे सस्ती कार नैनो। भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में एक रुपए प्रति मिनट की कॉल दर दुनिया में सबसे सस्ती कॉल दर है। नारायण हृदयालय और अरविंद नेत्रालय में दुनिया में सबसे कम खर्च में हृदय और आँख का ऑपरेशन किया जाता है।

नए-नए प्रयोग से उत्पादन में इतनी अधिक वृद्धि हुई है कि रुपये का मूल्य बढ़ने के बाद भी वस्तुओं के निर्यात में सलाना 30 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। चीन और कुछ दूसरे एशियाई देशों ने व्यापारिक लाभ की स्थिति को बनाए रखने के लिए विनिमय दरों में कृत्रिम बदलाव किया है। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक ने थोड़ी चालू खाता का घाटा और देश में पूंजी के आगम को बनाए रखा है। यह चीन की तुलना में ज्यादा स्थायी है।

नेशनल सैम्पल सर्वे ऑर्गनाइजेशन यानी, एनएसएसओ के अनुसार देश में गरीबी 1993-94 में 45.3 फीसदी से घटकर 2009-10 में 32 फीसदी हो गई। लेकिन एनएसएसओ के खपत के आंकड़़े में अभी राष्ट्रीय खपत के 43 फीसदी को ही शामिल किया जाता है। इसलिए गरीबी में वास्तविक कमी शायद इससे ज्यादा ही आई है। मोबाइल फोन की पहुंच देश की 70 फीसदी आबादी तक हो गई है। चुनाव के समय नेता टेलीविजन और लैपटॉप बांट रहे हैं। ये सब गरीबी में गिरावट के संकेत हैं।

भूखे लोगो की संख्या 1983 में 17.5 फीसदी से घटकर 2004 में 2.5 फीसदी रह गई। देवेश कपूर तथा उनके सहयोगियों के शोध कार्य में बताया गया है कि आर्थिक सुधार की नीतियों को लागू करने के बाद बाद उत्तर प्रदेश में दलितों के जीवन स्तर और सामाजिक हैसियत में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। साक्षरता पिछले दो दशकों में 21.8 फीसदी की दर से बढ़ी है, जबकि इससे पहले के दो दशकों में यह सिर्फ 13 फीसदी की दर से बढ़ी थी। 2001-11 की अवधि में महिला साक्षरता की वृद्धि दर कुल साक्षरता वृद्धि दर से अधिक रही है और गरीब राज्यों में दोनों ही तरह की साक्षरता में दूसरे राज्यों की तुलना में अधिक तेजी से वृद्धि हुई है। बिहार में महिला साक्षरता और कुल साक्षरता की वृद्धि दर क्रमशः 20 फीसदी और 16 फीसदी रही है। हालांकी पोषण सूचकांक की स्थिति काफी निराशाजनक है।

देश के छह बड़े गरीब राज्यों-उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ ,बिहार, ओडिशा और झारखण्ड-में जीडीपी विकास दर में 2004 के बाद दोगुनी-तीन गुनी वृद्धि हुई है। यदि ऐसा नहीं होता तो देश की जीडीपी विकास दर 8 फीसदी तक पहुंच नहीं पाती। वस्तुतः गरीब राज्यों में हुए आर्थिक विकास से देश भर की औसत आर्थिक विकास की दर में वृद्धि हुई। ये राज्य माओवाद से प्रभावित रहे हैं। इन राज्यों में माओवादी गतिविधियों को यहां की गरीबी का संकेतक माना जाता है। लेकिन इससे अधिक यह इन राज्यों में जनजातीय और गैर जनजातीय आबादी के बीच के तनाव और खास तौर से जमीन तथा खनन गतिविधियों पर तनाव का संकेतक है।

अभी सुधार हेतु बहुत से कार्य बचे हुए है। कई क्षेत्रों में स्वतंत्र प्रतियोगिता की जगह पूंजीवादी मित्रवाद हावी है। खासकर रियल एस्टेट, प्राकृतिक संसाधन और सरकारी ठेकों में यह अधिक हावी है। इसके कारण राजनेता धनवान बनते जा रहे हैं। सरकारी सेवाओं, जैसे रियायती दर पर भोज्य पदार्थ, रोजगार योजना, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। पुलिस और न्यायपालिका भ्रष्ट हो चूकी है, जो अपराध एवं जनता की शिकायतों को दूर नहीं कर पा रही है। अपराधी बड़े पैमाने पर राजनीति में प्रवेश कर चुके हैं।

अभी काफी अधिक आर्थिक सुधार किये जाने बाकी हैं। कारोबार करने की सुविधा को आधार मान कर तैयार की गई विश्व बैंक एवं आइएफसी की 183 देशों की सूची में भारत का स्थान 134वां है। लेकिन शासन व्यवस्था में सुधार की इससे भी अधिक जरूरत है। आखिर आर्थिक सुधारों ने विकास के कुछ चमत्कार तो दिखाए हैं। शासन व्यवस्था में सुधार का यह चमत्कार अभी तक देखने को नहीं मिला है।

- स्वामीनाथन अय्यर

casteism ke naam pe vote reservation-inse bhi sabse jada asan ho

casteism ke karan saare police/politician/criminal bach nikalte hai...........

उदारीकरण के दो मुख्य पैरोकारों के कारनामों का एक यह पक्ष भी है.

घपलों के गुरु-घण्टाल मनमोहन का असली चेहरा राजमाता की इच्छा, आदेश और आशीर्वाद से मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी की पावन पादुका का रूप धरकर युवराज का राजतिलक होने से पहले भारत के अस्थायी शासक के स्वाँग में राजनीतिक मंच पर मंडराते हुए विश्व-बैंक का वफ़ादार सिपाही बनकर देश के लाखों दुखी किसानों को आत्म-हत्या की ओर धकेलने का धतकरम करने और अस्सी करोड़ ग़रीबों को बीस रुपये रोज़ में गुज़ारा करने के लिये मजबूर करके उनका ख़ून पीकर भी ख़ुद को देशभक्त, ईमानदार और विशुद्ध शाकाहारी कहने वाले विश्व-विख्यात अर्थ-शास्त्री श्री मनमोहन सिंह वास्तव में कितने मासूम, ईमानदार और भोले हैं यह जानने के लिये उनके राजनीतिक जीवन के विगत बीस वर्षों में हुए आर्थिक घोटालों पर एक सरसरी नज़र डालते ही पता चल जायेगा, कि... उन्नीस वर्ष पहले(1991-96) इनके वित्त-मंत्री रहते हुए ही श्री हर्षद मेहता द्वारा किये गये सनसनीख़ेज़ शेयर-घोटाले में बी.शंकरानंद, पी.चिदंबरम और रामेश्वर ठाकुर तथा कई अफ़सरों को बलि के बकरे बनाकर ख़ुद भोला-भाला मासूम मेमना बनकर राजनीति की पतली कुंज-गली से यही मनमोहन देश-भर के गोप-गोपियों को भरमाकर मुरली बजाते हुए खिसक गये... 2-जी.स्पैक्ट्रम लाइसैंस घोटाले का जो शोर आजकल मच रहा है, उसका शुभारम्भ 1991-95 में ही हुआ. आज़ादी के बाद चवालीस बरसों में जितने टैलीफोन हमारे देश में लगे, उससे अधिक इन चार बरसों में ही लगाये गये. 1991 तक केवल पचास लाख फोन थे, लेकिन 1995 तक यही संख्या बढ़कर एक करोड़ पाँच लाख हो गई. यही अवधि दूर संचार घोटाले के अब तक चले एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपये से भी अधिक राशि के धारावाहिक और अनवरत घोटालों का गर्भाधान संस्कार सम्पन्न करने के लिये चुनी गई... महज़ तीन वर्षों में ही लखपति से अरबपति बनने वाली सुश्री नीरा राडिया के सौजन्य से चर्चित हुए कॉरपोरेट घरानों तथा धृतराष्ट्र के कलयुगी अवतार ऐम.करुणानिधि के लाडले सर्वश्री ए.राजा, कनिमोझी और दयानिधि मारन सहित अनेक व्यापारिक उच्चाधिकारियों को जेल पहुँचाने वाले इसी घोटाले में से पचासी हज़ार करोड़ रुपये का घपला किसी भी नीलामी के बिना ही श्री सुखराम ने अपने सुपुत्र के रिश्तेदारों की कंपनी ऐच.पी.सी.ऐल. के हित में कर दिया. इस कंपनी का सम्बन्ध इज़राइल की कंपनी बेजेक्यू टैलिकॉम से था. रिलायंस को यह सौदा पसन्द न था. इसलिये अपने हाथ ख़ाली रह जाने की कुण्ठा से चिढ़कर उसने अपने संपोषित सांसदों की सहायता से दस दिनों तक संसद की कारवाई ठप करवाकर सरकार को इस घोटाले की जाँच करने के लिये मजबूर कर दिया... चीनी माफ़िया की धौंसपट्टी में मँहगाई बढ़ाने वाले मराठा क्षत्रप श्रीमान शरद पवार को पानी पी-पीकर कोसने में भले ही काँग्रेस और भाजपा के साथ दूसरी विपक्षी पार्टियाँ भी जी-जान से लगी हुई हों, लेकिन उन्नीस वर्ष पहले ऐसे ही साढ़े छः सौ करोड़ रुपये की चीनी का खेल खेलकर श्री कल्पनाथ रॉय को जेल की हवा खाने के बाद अण्डर वर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम के साथ अपने रिश्ते के कारण आतंकवाद निरोधक क़ानून टाडा की मार भी झेलनी पड़ी थी. इन्हीं दिनों एक सौ तेंतीस करोड़ रुपयों का यूरिया ख़रीदे बिना ही सम्पूर्ण राशि का भुगतान तुर्की की कंपनी कर्सन को कराने वाले तत्कालीन प्रधान-मंत्री पी.वी.नरसिंह राव के सुपुत्र प्रभाकर राव और तत्कालीन उर्वरक मंत्री श्री रामलखन यादव के सुपुत्र श्री प्रकाश चन्द्र यादव का बाल भी बाँका हुए बिना ख़ामोशी से रफ़ा-दफ़ा करवाने में तत्कालीन वित्त मंत्री श्री मनमोहन सिंह जी की कुशल कार्य-प्रणाली अवश्य ही लाभदायक रही होगी... तीन महीने पहले दिल्ली की कनॉट प्लेस स्थित एक कंपनी से सत्तर करोड़ रुपये की नकद राशि पकड़ने के बाद सी.बी.आई. और प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अधिकारियों ने कहा था, कि यह हवाला का काला धन देश की छोटी-बड़ी सौ से ज़्यादा कंपनियों का है. इसमें अनेक राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के नाम शामिल होने की बातें कही गईं, लेकिन रातों-रात इस हवाला रैकेट की आग मनमोहन-जल से लैस फ़ायर-ब्रिगेड ने फ़ौरन बुझा दी... 1995 के हवाला रैकेट को याद कीजिये...मध्य प्रदेश के व्यवसायी ऐस.के.जैन के हवाला खेल में संलिप्त देश के इकतीस बड़े नेताओं और सोलह आला नौकरशाहों के उभरे नेक नामों में पन्द्रह नरसिंह राव-मंत्री-मण्डल के सदस्य थे, इसलिये सी.बी.आई. को श्री जैन के घर पर मारे गये छापे में सिर्फ़ अट्ठावन लाख रुपये नकद, दो लाख की विदेशी मुद्रा, पन्द्रह लाख के इन्दिरा विकास पत्र, दो डायरियाँ और एक नोट बुक ही बरामद हुए. श्री जैन की इस डायरी में मिले बहुत-से नामों पर हंगामा हुआ. पूछताछ के घेरे में आये प्रधान-मंत्री-कार्यालय तथा वित्त मंत्रालय की ओर शक की सुई घूमने पर उस समय की संसद की जसवन्त सिंह की अध्यक्षता वाली प्राक्कलन समिति की सिफ़ारिशों को ठण्डे बस्ते में डालकर सी.बी.आई. को स्वायत्त दर्ज़ा नहीं दिया गया, क्योंकि 1995 में 4 मार्च से 12 मार्च के दौरान श्री जैन ने सी.बी.आई. के सामने अपराध दण्ड संहिता की धारा 161 के तहत जो कबूल किया, उससे प्रधान मंत्री श्री नरसिंह राव ही इस हवाला काण्ड के शिकंजे में फँस रहे थे... विचारणीय सत्य यह है, कि तब हवाला में जब्त रकम महज़ सत्तर करोड़ ही थी, जबकि पिछले तीन वर्षों में सात अरब से अधिक रकम जब्त की जा चुकी है और हमारे सुयोग्य मनमोहन जी की मनमोहक शैली में जमुना-तट पर बज रही चैन की बाँसुरी सुनकर संसदीय गोप-गोपियाँ रास रचा रहे हैं... घोटालों के इस गुरु-घण्टाल की सरपरस्ती में खनन की ज़मीन को ख़ैरात की तरह निजी कंपनियों को बाँटने का गोरखधन्धा भी शामिल है. आज भाजपा के लिये लूट-खसूट की ज़रूरत बन चुके बेल्लारी जैसे अनुष्ठान का मूल-मंत्र पहली बार 1995 में ही पढ़ा गया था. तब तत्कालीन कोयला-मंत्री श्री सन्तोष मोहन देव ने 240 करोड़ की बैलाडीला कोयला खान महज़ सोलह करोड़ में निप्पन डैण्ड्रो को सौंप दी थी. चूँकि निप्पन डैण्ड्रो की प्रधान-मंत्री नरसिंह राव से प्रगाढ़ता थी, इसलिये वफ़ादार वित्त-मंत्री मनमोहन सिंह जी ने हमेशा की तरह अपनी आँखें मूँदकर महात्मा गाँधी के बन्दर का किरदार निभाया. कुछ-कुछ ऐसा ही कारनामा तत्कालीन शहरी विकास-मंत्री श्रीमती शीला कौल ने भी दो हज़ार सरकारी मकान अपने चहेतों को बाँटकर किया. इन्हीं दिनों आई.टी.सी. ने साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा का घपला किया था. गोल्डन टोबैको कंपनी के श्री संजय डालमिया भी चार सौ करोड़ रुपये की हेराफेरी में फँसे. शा वैलेस कंपनी के श्री ऐम.आर.छाबरिया सौ करोड़ रुपये और गणपति ऐक्सपोर्ट के ओ.पी. अग्रवाल नब्बे करोड़ रुपये के घपले में फँसे थे. लेकिन आजकल तो शेयर बाज़ार की हालत इतनी बुरी हो चुकी है, कि औसतन हर तीन में से एक कंपनी की गतिविधियों पर सी.बी.आई. ने नज़र रखी हुई है. 1150 कंपनियों के ख़िलाफ़ बाक़ायदा हवाला और काले धन के सिलसिले में जाँच चल रही है. बरास्ता मारीशस और मलेशिया हवाला के जरिये विदेशी मुद्रा के रूट से बच्चा-बच्चा वाक़िफ़ है. इन रास्तों से आने वाली मुद्रा को विदेशी निवेश दिखाने वाली कंपनियों ने अपने धन्धे को बेरोकटोक चलाते हुए ख़ुद को बचाये रखने की ऐसी व्यूह-रचना बनाई हुई है कि पचास लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की पूँजी के ओर-छोर को पकड़ पाना असम्भव-सा हो गया है, क्योंकि इसे पकड़ा गया, तो मनमोहनॉमिक्स का वह ढाँचा चरमरा जायेगा, जिस पर खड़े होकर अनेक भारतीय कंपनियों ने विदेशों में निवेश करना शुरू किया. इसी पुष्पक विमान पर सवार होकर हाल ही में देश के शीर्ष कॉरपोरेट घरानों ने सैंतालीस अरब डॉलर विदेशों में निवेश किया और भारत में सिर्फ़ दो करोड़ बीस लाख डॉलर निवेश किये... प्रधान-मंत्री बनने के बाद वर्ष 2008 में संकट में घिरी सरकार की साख को बचाने के लिये झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसद ख़रीदने के लिये नोटों की माँग उठी, तो तत्कालीन पैट्रोलियम मंत्री श्री सतीश शर्मा को यह ज़िम्मेवारी सौंपी गई. इन मंत्री जी ने पैट्रोलियम सचिव श्री खोसला को तलब करके कुछ ख़ास कंपनियों को पैट्रोलियम विकास परियोजना के तहत कुछ तेल के कुँए देने को कहा. इस निर्णय का ओ.ऐन.जी.सी. के कुछ अफ़सरों ने विरोध किया तो मंत्री महोदय ने उन्हें डरा-धमकाकर कुछ कुँए ऐस्सार, वीडियोकॉन और रिलायंस को बाँट दिये...एक महीने बाद खोसला जी ने पद से इस्तीफ़ा देकर रिलायंस का दामन थाम लिया. ऐस्सार से मिले सात करोड़, रिलायंस से मिले चार करोड़ और वीडियोकॉन से मिले दो करोड़ में से तीन करोड़ झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को मिले. बाक़ी दस करोड़ कहाँ गये, आप ख़ुद ही सोचिये... अब प्रश्न यह है कि घोटालों की पटरियों पर घपलों के ईंधन के सहारे दौड़ रही उच्च विकास-दर की आर्थिक रेल के चालक प्रधान-मंत्री, इस पर सवार सेठों, साहूकारों और लुटेरों द्वारा फैलाई गई कमरतोड़ महँगाई और जानलेवा भ्रष्टाचार से पल-पल कुचले जा रहे इस देश को कौन बचाये...? —भुवनेश कुमार ई-मेलः bhuwaneshkumar220@yahoo.com